Month: July 2021

श्रावण और तीज़ : हरियाली, कजरी और हरितालिका तीज़

depth of field photo of diety god statuette

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार पांचवां महीना और मानसून का दूसरा महीना श्रावण का होता है जिसको भोजपुरी में सावन भी बोलते हैं। श्रावण मास बड़ा ही शुभ और भक्तिमय माहौल लिए हुए होता है जगह जगह कांवरिये बोल बम करते गंगा जल लेकर भोलेनाथ के धाम जाते दिख जाते हैं। श्रावण मास के सोमवार को व्रत करने से मनचाहा पति मिलने की आस्था रखने वाले बहूत लोग हैं। इन्हीं व्रत और त्यौहारों में एक व्रत होता है तीज़ का। तीज़ का मतलब तीसरा दिन या तो पूर्णिमा के बाद का तीसरा दिन या फिर अमावस्या के बाद तीसरा दिन। इस तरह यह एक महीने में दो बार पड़ता है एक बार शुक्ल पक्ष की तृतीया और एक कृष्ण पक्ष की तृतीया।श्रावण और भाद्रपद दोनों महीने में 4 तृतीया आती है जिसमें से 3 तृतीया को हम तीज़ के रूप में मनाते हैं जो मुख्य रूप से उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, और राजस्थान में बहुत ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। तीज में विवाहिता महिलाएं अपने पति की मंगल कामना के लिये और विवाह योग्य लड़कियां अपने मनपसंद वर के लिए मां पार्वती और महादेव की आराधना करते हैं निर्जला व्रत और पूजा बंदन भी करते हैं।

हरियाली तीज

यह श्रावण के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है और उसके 2 दिन बाद नागपंचमी का त्योहार आता है। जैसा कि इसके नाम से ही ज्ञात होता है इसमें स्त्रियां हरे वस्त्र पहनकर और हरे रंग के ही श्रृंगार करके पूरे दिन व्रत रहकर शाम को मां पार्वती और शंकर जी की प्रतिमा की पूजा करती हैं और दिन भर अपने को व्यस्त रखने के लिए माला फूल से सजावट और बाकी परिवार वालों के लिये तरह तरह के व्यंजन बनाती हैं। 2021 में यह 11 अगस्त को होगा।

Ladies celebrate Hariyali Teez

कजरी तीज़

यह भाद्रपद शुक्लपक्ष की तृतीया को मनाया जाता है और रक्षा बंधन के तीन दिन बाद और इसके 5 दिन बाद कृष्ण जन्माष्टमी मनाया जाता है। कजरी का शाब्दिक अर्थ ही विछोह है तो जहाँ भी यह त्योहार मनाया जाता है वहाँ विवाहिता स्त्रियां इसे अपने मायके जाकर मनाती हैं मतलब ससुराल और पति से दूर। इस दिन नीम की पूजा होती है और तरह तरह के झूले डालकर लड़कियां और स्त्रियां तमाम गीत गाते हुए झूला झूलती हैं। कजरी गीत अपने आप में अलग ही शैली है और इसको पसन्द करने वालों का अपना अलग ही एक वर्ग है। मिर्ज़ापुर की कजरी बहुत ही मशहूर है। यह मानसून त्यौहार है और इस समय तक किसान अपने खेतों में खरीफ फसलों की रोपाई करते हैं इसी के महत्व को बताने के लिए गांव में बच्चियां मिट्टी का एक गोला बनाकर उसमें जौ का बीज लगाकर 10 से 15 दिन उसकी देखभाल करती हैं और उसके बाद उसके फसल (जरई)को सबके कान पर रखकर आशीर्वाद लेते हैं। 2021 में यह 25 अगस्त को है।

wood sea landscape beach

हरितालिका तीज़

यह भाद्रपद के कृष्णपक्ष की तृतीया को मनाया जाता है इसके अगले दिन ही गणेश चतुर्थी मनाया जाता है और हरियाली तीज के एक महीने बाद पड़ता है। इस दिन विवाहिता स्त्रियाँ 24 घण्टे निर्जला ( बिना अन्न, जल) व्रत रहकर भगवान शिव व पार्वती माँ की आराधना करती हैं और अपने सुहाग और संतान की दीर्घायु और मंगलकामना की प्रार्थना करती हैं। 2021 में यह त्योहार 9 सितंबर को पड़ रहा है।

Beatuitful bride celebrating Haritalika Teez

व्रत कैसे करते हैं

हरितालिका तीज़ तीनों तीजों में सबसे महत्वपूर्ण और सबसे कठिन होता है। इसको करने वाली स्त्री सुबह सूर्योदय होने से पहले अपने दैनिक कार्य निवृत्त करके स्नान ध्यान करके घर को साफ सुथरा करके तोरण मंडप सजाती है। बालू या मिट्टी से शिव गौरी की प्रतिमा बनाती है 16 श्रृंगार करके सौभाग्य सूचक सभी सामग्री जैसे फल, फूल, पान, वस्त्र, दुग्ध, दही, मिष्ठान, बेलपत्र, अक्षत, कुमकुम सुहाग की सामग्री ( चूड़ी, बिंदी आदि) इकट्ठा करके फिर किसी आचार्य से या स्वयं व्रत कथा वाचन करती है। अगले दिन यह सब सामग्री प्रतिमा सहित नदी में प्रवाहित करते हैं।

तृतीया तिथि के सूर्योदय से चतुर्थी तिथि के सूर्योदय तक बिना जल और अन्न के रहना होता है साथ ही साथ इस व्रत में शयन वर्जित होता है। इस व्रत को करने वाला इस व्रत को छोड़ नहीं सकता है विशेष परिस्थितियों जैसे किसी बीमारी या गर्भावस्था में उसकी जगह उसके पति उसका व्रत कर सकते हैं।

व्रत के पीछे की मान्यता और शाब्दिक अर्थ

ऐसी मान्यता है कि मां पार्वती और शिव जी की जोड़ी आदर्श जोड़ी है जन्म जन्मांतर में हर जन्म में माँ पार्वती ने शिव जी को ही पति के रूप में चुना। मां पार्वती के रूप में जब उनका जन्म हुआ तो उनके पिता गिरिराज हिमालय और माता मैना उनकी शादी विष्णु जी से करवाना चाहते थे ऐसे में वह जंगल में जाकर बहुत कठोर तप की जिससे शिव जी का आसन हिलने लगा तब भगवान भोलेनाथ ने मां पार्वती को अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। जंगल में तप करने के लिए मां पार्वती की सहेलियाँ उन्हें हरण करके ले गईं इसीलिए इस व्रत को हरतालिका ( हरत+आलिका) कहते हैं जिसमें आलिका मतलब सहेलियों से है और हरत मतलब भगा ले जाना।

तीज़ के बारे में यह मान्यता भी है कि देवी सती की मृत्यु के बाद कई सौ साल के लंबे इंतजार के बाद इस दिन माँ पार्वती को भगवान शिव की स्वीकृति मिली थी उनकी अर्धांगिनी के रुप में। स्त्रियों और बच्चों में इन त्योहारों का उत्साह देखते ही बनता है। एक तो श्रावण मास में प्रकृति अपने उत्कर्ष पर होती है ऊपर से यह तीज़ त्योहार उसपर चार चाँद लगा देते हैं।

इन सब पौराणिक कथाओं के अलावा इस व्रत का  वैज्ञानिक कारण यह है कि श्रावण और भाद्रपद मास की हरियाली और मनभावन मौसम में कौन सी स्त्री अपने आपको सुसज्जित नहीं करना चाहेगी साथ ही साथ वज़न नियंत्रण और मानसून की बीमारियों से दूर रहने के लिए व्रत रहना काफी फलदायक होता है।

तो आप भी मानसून के साथ ही ये पर्व मनाइये और कुछ जानकारी अधूरी रह गई हो तो हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।

गुरू पुर्णिमा: नमन गुरुजन को

light man people woman

 

 

हमलोग बचपन से ही सुनते आ रहे हैं :

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेेेश्वरः ।

गुरुः साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।

मतलब ब्रम्हा विष्णु महेश सब एक गुरु में ही शामिल हैं गुरू की पदवी सबसे बड़ी है। वैसे तो साल के 365 दिन भी गुरु की महिमा और पूजा के लिए कम हैं लेकिन आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन हमारे वेदों के जनक ऋषि वेदव्यास का जन्म हुआ था ।  उनका बचपन का नाम कृष्ण द्वैपायन व्यास था और वह ऋषि पराशर के पुत्र थे । उन्होंने महाभारत के साथ ही साथ चारों वेदों ऋग्वेद, सामवेद ,अथर्ववेद और यजुर्वेद को लिखा। उन्हें  आदिगुरु का दर्जा प्राप्त है और उन्हीं के सम्मान में तब से यह दिन गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है ।

2021 में यह 24 जुलाई को है।

गुरु पूर्णिमा, जिसमें सभी लोग अपने गुरुओं खासकर अध्यात्म  और अकादमी गुरु से मिलकर उनकी पूजा अर्चना करते हैं। मिर्ज़ापुर में कुछ गुरु जैसे स्वामी अड़गड़ानंद, देवरहा बाबा, जैसे गुरुओं का आश्रम भक्तों से भरा होता है। और भी अध्यात्म गुरु जैसे स्वामी परमहंस, सत्य साईं बाबा, सुदर्शनाचार्य, स्वरूपानंद सरस्वती, स्वामी ज्ञानानंद, ओशो जैसे अनेकों नाम शामिल हैं जिनके भक्तों की संख्या करोड़ों में हैं । इन गुरुओं की भी गद्दी परम्परा होती है उनके बाद उनके वारिस उनकी गद्दी सम्हालते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी गुरु और शिष्य परम्परा चलती रहती है।

गुरु में ‘गु’ का मतलब अंधकार या अज्ञान और ‘रु’ का मतलब दूर करने वाला अर्थात गुरु का शाब्दिक अर्थ ही है अंधकार या अज्ञान दूर करने वाला। इस पर्व की ख़ास बात यह है कि यह हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख सभी धर्मों में मनाया जाता है।

इस दिन खीर दान में देने की भी परम्परा है। यह पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है आषाढ़ मास चतुर्मास (आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और अश्विन) में पड़ता है जिसमें सभी गुरु, सन्त महात्मा नगर, कोलाहल से दूर अध्यात्म और ज्ञान की तलाश में वन में प्रस्थान कर जाते हैं और इस समय प्रकृति भी हरियाली और ख़ुशनुमा माहौल लेकर ज्ञान बढ़ाने के लिए अनुकूल वातावरण देती है।

जीवन सतत बढ़ते रहने का ही नाम है और आगे बढ़ने के लिए कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए इस संसार में कुछ भी परफेक्ट नहीं हैं ज्ञान अगर अपने से छोटे से भी मिले तो ले लेना चाहिए । कई बार समस्या इतनी गम्भीर नहीं होती जितनी हम समझते हैं फर्क सिर्फ नज़रिए का होता है कबीर दास का एक दोहा है:

गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट ।

अंदर हाथ सहार दे बाहर बाहै चोट ।।

जिस तरह आप किसी कुम्हार को बर्तन बनाते हुए देखेंगे तो ऐसा लगेगा कि वह बरतनों पर बहुत तेज़ी से मारकर उन्हें तोड़ न दे लेकिन उसका एक हाथ बर्तन के अंदर भी होता है जो बर्तन को सहारा देता है ठीक उसी तरह का गुरु शिष्य का रिश्ता भी होता है हमारे अंदर की कमियों और बुराइयों को दूर करने के लिये कई बार गुरु कई कठोर निर्णय लेते हैं जो तुरंत तो दुखदाई होते हैं लेकिन दूरगामी सुखद परिणाम देते हैं।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में वैसे तो हम सभी के लिये मॉडर्न गुरु गूगल ही हो गया हैं, फिर भी अपनी ज़िंदगी को एक दिशा देने वाले अपने गुरुजन को कम से कम इस दिन जरूर याद करें और दिल से उनका धन्यवाद करें क्यूंकि जब हम जिंदगी का पहला कदम उठाने में हिचकिचा रहे थे या डर रहे थे तब हमारा हाथ मज़बूती से थामे ये गुरुजन ही थे वो मां के रूप में हों या स्कूल की पहली टीचर के रूप में, हमें हर मुश्किल से लड़ना सिखाया और हर हालात में साथ खड़े रहे।

गुरु पूर्णिमा के दिन ऐसे सभी गुरुओं को शत शत नमन।

 

मानसून के साथ ही बढ़ता सौंदर्य मिर्ज़ापुर का

मिर्ज़ापुर वेबसेरीज़ के 2 सीजन आ चुके हैं और हम में से बहुतों ने ये वेबसेरीज़ देख भी चुकी होगी। इस वेबसेरीज़ पर काफी हंगामा भी हुआ तो कइयों को इसे वास्तविक रूप से देखने का भी मन हो रहा होगा तो जब भी आपको समय मिले देखने की कोशिश जरूर करिएगा। वैसे तो यह स्थान मां विंध्यवासिनी के धाम के रूप में काफी प्रसिद्ध है और जो लोग विंध्याचल आते हैं वो मां अष्टभुजा और माँ काली की कालीखोह भी जाकर दर्शन ज़रूर करते हैं, ऐसी मान्यता है कि यह त्रिकोण पूरा करने से आपका दर्शन सफल हो जाता है।

लेकिन एक बात और है जो मिर्ज़ापुर को और खास बनाता है और वो है यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। मिर्ज़ापुर हमारा पैतृक निवास होने की वजह से हमें तो हमेशा ही लुभाता है आशा है कि आपलोग भी इसके प्राकृतिक सौंदर्य को पास से देखकर खुश होंगे और प्रशासन भी यहाँ तक पहुंचने के रास्तों को सुगम बनाने की तरफ ध्यान दे पाए। तो आज हम मानसून में इसकी सुंदरता बढ़ाने वाले झरनों की बात करते हैं। वैसे तो मिर्ज़ापुर विंध्य क्षेत्र में होने के कारण पहाड़ी क्षेत्र है और इस वजह से बारिश के मौसम में यहाँ जहाँ तहाँ ऐसे ही वाटरफॉल्स बन जाते हैं कुल मिलाकर यहाँ झरनों की संख्या 40 से ऊपर ही होगी लेकिन हम यहाँ उन झरनों की बात कर रहे जो केवल बारिश में ही नहीं बनते अपितु पूरे साल भर इनमें पानी होता है और यह बाँध बनाकर सिंचाई और बिजली उत्पादन जैसे कामों में सहायक भी हैं। तो आइए हम झरनों की यात्रा की शुरुआत करते हैं बहुत ही रमणीय और पर्यटकों का मनपसंद विंढम फॉल से

1. विंढम फॉल

मिर्ज़ापुर से 14km दूर ये वाटरफॉल बहुत ही मनमोहक है। बारिश के मौसम और पर्यटन विभाग और घूमने जाने वालों की लापरवाही की वजह से हो सकता है आपको थोड़ी साफ सफाई की दिक्कत महसूस हो लेकिन प्रकृति ने ज़ी भरकर इसको अपना सौंदर्य दिया है। वीडियो में भी इसकी कल कल करती ध्वनि किसी का भी ध्यान अनायास ही आकर्षित करने वाली है।

2. सिरसी वॉटरफॉल 

मिर्ज़ापुर से घोरावल रोड पर लगभग 45 km बहुत ही मनमोहक और प्राकृतिक छटाओं से भरपूर वाटर फॉल है सिरसी वॉटरफॉल । यह वाराणसी से लगभग 55 km है।

यहाँ पर ऊंचाई से कई जगहों पर से पानी गिरता है और ऐसे में कई झरने एक साथ दिखाई देते हैं जिनको पास से देखने पर यह दृश्य और भी मनमोहक हो जाता है।

सिरसी वाटरफाल सिरसी बांध से गिरता है तो वॉटरफॉल पहुंचने से पहले  आपको यह बांध भी जरूर देखना चाहिए जो बिल्कुल इस तरह दिखता है जैसे कि हम वाकई किसी समंदर के किनारे आ गए हैं जिसका कोई ओर छोर नही हैं।

3. लखनिया हिल्स और वाटरफॉल

 मिर्ज़ापुर जिले में अहरौरा नाम का एक छोटा सा कस्बा है वहीं पर आपको लखनिया वॉटरफॉल मिलेगा जिसकी ऊंचाई लगभग 150 मीटर है । लखनिया वॉटरफॉल के आसपास ही एक एम्यूजमेंट पार्क है जिसका नाम एक्वा जंगल वाटरपार्क एंड रिसोर्ट है जोकि उस क्षेत्र में अपने आप में अनोखा पार्क है जहां बच्चे और बड़े सभी एन्जॉय कर सकते हैं।

4. टांडा फॉल

मिर्ज़ापुर से 7km दक्षिण की ओर जाने पर बहुत ही मनमोहक टांडा वॉटरफॉल है। यह टांडा बांध से होकर गिरता है तो इसमें भी लगभग साल भर ही पानी रहता है। यह मिर्ज़ापुर शहर से सबसे नजदीक है और आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता देखने के लिए सैलानियों की भीड़ हमेशा ही मिल जाती है।

5. राजदारी और देवदारी वाटरफॉल्स

वाराणसी से लगभग 75 km की दूरी पर चंद्रप्रभा अभ्यारण्य है और वहीं पर चंद्रप्रभा डैम है उसी पर 65 मीटर की ऊंचाई वाला राजदारी वाटरफॉल है और उसके 500मीटर की दूरी पर ही नीचे की तरफ देवदारी वाटर फॉल मिलता है।

राजदारी

6. चुना दरी फॉल

वाराणसी से 44 km की दूरी पर रॉबर्ट्सगंज के रास्ते पर, 24 km चुनार से, मिर्जापुर से 59 km और अहरौरा से 7 km की दूरी पर यह खूबसूरत वॉटरफॉल है। इस वाटरफॉल की सुन्दरता नीचे रखी चट्टानों से देखने से और बढ़िया लगती है जो कि काफी खतरनाक भी है क्योंकि बारिश के मौसम में वह फिसलने लगती है जिससे आए दिन वहाँ दुर्घटना होती रहती है।

7. मुक्खा फॉल

 रॉबर्ट्सगंज घोरावल रोड पर  रॉबर्ट्सगंज से 55 km पश्चिम में और शिवद्वार से 15 km की दूरी पर बहुत ही मनमोहक मूक्खा वाटरफॉल है। शिवद्वार घोरावल से 10 km दूर भगवान शंकर का 11वीं सदी का बना हुआ बड़ा अद्भुत मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि यह अपने आप में एकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान शिव की शिवलिंग पर नहीं उनकी प्रतिमा पर जल अर्पण किया जाता है। यहाँ भगवान शिव और माता पार्वती की काले पत्थर की मूर्ति है।

8. सिद्धनाथ दरी

लखनिया दारी की तरह ही यह वाटरफॉल भी काफी शांति और प्राकृतिक सौंदर्य को अपने अंदर समाहित किये हुए है। यह वॉटरफॉल चुनार में पड़ता है और यह सक्तेशगढ़ में बाबा अड़गड़ानंद के आश्रम से 2 km की दूरी पर ही है। लेकिन यहाँ साल के पूरे 12 महीने पानी नहीं मिलता।

9. कुशियरा फॉल

यह फॉल मिर्ज़ापुर शहर से 38 km की दूरी पर है। यहां पहुंचने के लिए मिर्जापुर से प्रयागराज जाने का शॉर्टकट रास्ता जो कुशियरा जंगल से होकर गैपुरा जाता है उधर से होकर जाना पड़ता है। मिर्ज़ापुर रीवाँ रोड  पर लालगंज से उत्तर दिशा में जाने पर भी यही रोड मिलती है। यह प्रकृति की गोद में छुपा अनमोल तोहफा है यहां के लोगों के लिये और पर्यटकों के लिए भी।

10. खरंजा वाटरफॉल

यह वाटरफॉल मिर्जापुर से 15 km अराउंड बरकछा रोड पर है। विंढम फॉल का पानी खरंजा में जाकर गिरता है और एक वाटरफाल बनाता है। इसका पानी आसपास के एरिया में सिंचाई के काम आता है।

11. जोगिया दरी

यह मिर्ज़ापुर के मड़िहान तहसील से 5 km उत्तर की तरफ जंगल में है। इस फाल की ऊंचाई 300 फ़ीट है, आसपास काफी हरियाली है और काफी रोमांचक दृश्य है। यहाँ तक पहुंचने का रास्ता काफी पथरीला और जंगली है दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आता तो आप अपना समय और वाहन दोनों ही लेकर वहाँ जाएं।

बोकरिया फाल, पेहती की दरी, भैरो कुंड और जल प्रपात काली कुंड और जल प्रपात मेजा रिजर्वायर, जरगो जलाशय जैसे लगभग 40-45 वाटरफॉल्स यहाँ पर और भी हैं जो पिकनिक स्पॉट के साथ ही साथ मिर्ज़ापुर के सौंदर्य को बढ़ाते हैं और प्रशासन यहाँ तक पहुंचने के रास्तों पर और यहां के सौंदर्यीकरण पर ध्यान दे, तो यहाँ का व्यापार और रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है।

आपने गौर किया होगा कि कुछ वाटरफॉल्स सोनभद्र जिले में भी आते है दरअसल 1 अप्रैल 1989 से पहले सोनभद्र और मिर्जापुर दोनों एक ही जिला मिर्ज़ापुर में थे लेकिन बाद में इसकी भौगोलिक विविधताओं और शासकीय काम सुचारू रूप से न चल पाने की वजह से इसे दो ज़िलों सोनभद्र और मिर्ज़ापुर में बांट दिया गया तब से इसके औद्योगिक विकास में काफी गिरावट हो गई पर प्रकृति और देवों का बरसाया प्यार आज भी जिले की खूबसूरती बढ़ा रहा है। तो आपको जब भी मौका मिले मिर्ज़ापुर को नजदीक से ज़रूर देखें और वहाँ की प्राकृतिक और धार्मिक दोनों खूबसूरती को आत्मसात करें साथ ही साथ हमें भी सुझाव और चित्र भेज सकते हैं कि और क्या क्या देखा जा सकता है।

“शेरनी ” एक जंग इंसान और जानवरों के बीच

शेरनी मूवी बैनर

कोरोना काल में जब सारे सिनेमाघरों पर ताले लगे हुए हैं और सब लोग घरों में बंद हैं ऐसे में ओटीटी प्लेटफार्म फ़िल्म इंडस्ट्री और दर्शक वर्ग दोनों के लिए ही उम्मीद की किरण है। इसी ओटीटी प्लेटफार्म पर 18 जून को मूवी रिलीज़ हुई है” शेरनी” जो जंगल की शेरनी के साथ ही साथ नायिका के संघर्ष को भी बयां करती है।

विद्या बालन स्टारर शेरनी मूवी एक जबरदस्त प्रहार है मनुष्य के प्रकृति से खिलवाड़ के नतीजों को दिखाती हुई। यह बताती है कि जानवर हमारे पास नहीं आ रहे बल्कि हम प्रकृति का दोहन करके उनके प्राकृतिक आवास से छेड़छाड़ करके उनको बाहर निकलने पर मज़बूर कर रहे हैं। इस मूवी में एक डायलाग है कि अगर आप जंगल मे 100 बार जाते हो बाघ देखने तो हो सकता है एकाक बार हमें बाघ दिख जाये लेकिन बाघ ने आपको 99 बार देखा होगा।

फ़िल्म में एक डॉयलोग है “अगर विकास के साथ जीना है तो पर्यावरण को बचा नहीं सकते और अगर पर्यावरण को बचाने जाओ तो विकास बेचारा उदास हो जाता है”।

कुल मिलाकर फ़िल्म निर्माता अमित मसूरकर ने अच्छी कोशिश की है लेकिन कहानी का लय अंत तक ठीक नहीं बैठ पाया है।

क्या है कहानी

फ़िल्म की कहानी विद्या बालन जो इस मूवी में विद्या विंसेट के किरदार को जी रही हैं एक वन विभाग अधिकारी बनी हैं जो 6 साल के डेस्क जॉब के बाद फील्ड में काम करने आई है। उनका प्रोमोशन भी काफी समय से अटका हुआ है। ऊपर से उनके फ़ैमिली में उनके पति की जॉब रेसेशन की वजह से पहले से खतरे में थी तो विद्या अपनी सरकारी नौकरी को छोड़ना अफ़्फोर्ड नहीं कर सकती थी।

लेकिन यहाँ आते ही उनका सामना एक नरभक्षी बाघिन के आतंक से होता है। जिसमे वहाँ के लोकल पॉलिटिकल लोग अपनी पॉलिटिक्स की रोटियाँ भी सेंकने में लगे हैं। विद्या फारेस्ट ऑफिसर के रूप में बाघिन को मारने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं बल्कि कहीं दूर जंगल में छोड़कर आना चाहती हैं। वहीं उनके सीनियर बंसल ( बृजेन्द्र कला) समस्या से भागते हुए वहां से ट्रांसफर चाहते हैं। पॉलिटिकल लोग मशहूर शूटर पिंटो (शरत सक्सेना) को बुलाकर बाघिन से छुटकारा चाहते हैं।

बाद में पता चलता है कि बाघिन के दो बच्चे भी हैं। विद्या को किसी का भी सपोर्ट नहीं है केवल कॉलेज के प्रोफेसर हसन नूरानी (विजय राज) को छोड़कर।

इसमें ये देखना दिलचस्प होगा कि विद्या बाघिन और उसके बच्चों को बचाते हुए अपनी नौकरी को भी एक ऊंचाई दे पाती हैं या बाघिन भी मरेगी और विद्या भी कहीं नकली जानवरों के साथ काम करती दिखेंगी इसके लिये आपको अमेज़न प्राइम पर यह मूवी देखनी पड़ेगी।

कुल मिलाकर अगर आप विद्या बालन के जबरदस्त फैन हैं और पर्यावरण और पशु सरंक्षण जैसे गंभीर मुद्दे को नजदीक से समझना चाहते हैं तो ये मूवी आपके लिये ही है और अगर केवल मनोरंजन  चाहते हैं तो फिर ये मूवी आपके लिए नहीं है।

ब्रह्मकमल(Brahmkamal):: एक करिश्माई पुष्प या रहस्यमयी कैक्टस

कमल का फूल कीचड़ से निकलते हुए भी बहुत खूबसूरत और पवित्र होता है। यह हम मनुष्यों को काफी अच्छी सीख देता है कि हम अपने आसपास के वातावरण से विचलित न होकर सच्चाई और सन्मार्ग का पथ चयनित करें। कमल का फूल सच्चाई, सद्भावना और ऐश्वर्य का प्रतीक है और हमारे भारत देश का राष्ट्रीय फूल भी है।

धार्मिक महत्व

हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल के पुष्प से सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मदेव की उत्पत्ति हुई थी और उनका आसन भी कमल का फूल ही माना जाता है। उनके साथ ही साथ लक्ष्मी जी का आसन भी यही है। वैसे तो पानी में पाये जाने वाले कमल के फूल की जानकारी तो आम हैं, इसलिए आज हम बहुत ही चमत्कारी और रहस्यमयी फूल ब्रम्हकमल की जानकारी लेते हैं। वैसे तो कमल भारतवर्ष का राष्ट्रीय पुष्प है लेकिन ब्रह्मकमल कमल के फूल से अलग प्रजाति का पुष्प है जो हिमालय क्षेत्र हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी प्रदेशों में ही प्राकृतिक रूप से पाया जाता है।

दुविधा ब्रम्हकमल के बारे में

मैंने अपने बालकनी में ब्रम्हकमल का पौधा लगाया और उसके फूल को देखकर मन अतिप्रसन्न हो गया। बॉटनी की छात्रा होने के कारण उसके बोटानिकल नाम जानने की इच्छा हुई तो गूगल सर्च किया तब मेरे सामने बड़ी दुविधा वाली स्थिति आ गई। ब्रह्मकमल नाम खोजने पर दो बोटानिकल नाम सामने आए एक सौससुरी ऑब्वल्लता ( Saussurea obvallata ) और दूसरा एपिफिल्लुम ऑक्सिपेटालूम (Epiphyllum oxypetalum). अब दुविधा यह कि एक ही ब्रह्मकमल के दो बोटानिकल नाम कैसे हो सकते हैं नाम के साथ ही इनका परिवार भी अलग है। जहाँ पहला अस्टरसै परिवार का सदस्य है वही दूसरा केक्टसए परिवार का। और खोज बीन के बाद पता चला कि असली ब्रह्मकमल केवल पहाड़ी जगहों पर ही पाया जाता है जबकि हम जिसे ब्रम्हकमल समझकर अपनी बालकनी में लगाए हैं वो नाईट क्वीन या आर्किड कैक्टस है जिसका एक नाम निशिपद्मा भी है। जोकि ब्रह्मकमल की तरह ही रात में कुछ घण्टों के लिए खिलता है और परागण को आकर्षित करने के लिए बहुत स्ट्रांग महक बिखेरता है इसीलिए लोग खासकर दक्षिण भारत में इसको भी ब्रम्हकमल बोल देते हैं। यहाँ मैं क्रमवार फोटो भी दे रही हूँ जिसमें पहली फोटो है उत्तराखंड राज्य के राज्य पुष्प ब्रम्हकमल सौससुरी ऑब्वल्लता ( Saussurea obvallata) की जो यहां के तीर्थस्थान बद्रीनाथ और केदारनाथ में यह पुष्प अर्पित किया जाता है। दूसरी फोटो मेरे बालकनी में लगे हुए एपिफिल्लुम ऑक्सिपेटालूम (Epiphyllum oxypetalum) की।

Brmhkamal vs night queen

क्या है रहस्य

यह शाम को 7 बजे से लेकर रात 1 बजे तक खिलता है इसलिए इन्हें रहस्यमयी फूल कहते हैं क्योंकि कई बार तो इसका फूल कोई देख ही नहीं पाता। ऐसा माना जाता है कि इसके फूल को देखने वाले को सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य सब कुछ प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता थी असली ब्राह्म कमल का फूल 14 वर्ष में एक बार आता है और पौधा ही दुर्लभ होता है और इसकी जानकारी भी कम होती हैं। जबकि नाईट क्वीन का प्लांट हमारे जैसे कुछ लोग अपने बालकनी में असली ब्रह्म कमल के नाम पर इसको लगाने लगे हैं और साल में 2,3 बार इसके फूल भी दिख जाते हैं। मुख्य रूप से जुलाई से सितंबर के महीने में इसमें फूल निकलते हैं।

 

नाईट क्वीन, निशिपद्मा या Epiphyllum oxypetalum पौधे की देखभाल

  1. यह पौधा कटिंग से ही लगाया जा सकता है।
  2. अगर इसको लगाना है तो ठन्डियों से तुरंत पहले लगाया जाना चाहिए।
  3. इसको लगाने के लिए इनडाइरेक्ट सूर्य का प्रकाश और उपजाऊ लेकिन पथरीली मिट्टी चाहिए।

यह कैक्टस प्रजाति का पौधा है तो इसको ज्यादा पानी की ज़रूरत नही होती। 2,3 दिनों में एक बार पानी देने पर भी यह बढ़िया रहता है।

इसका पूरा पौधा ही औषधीय गुणों से भरा हुआ हैइसके कुछ औषधीय गुण निम्न हैं::

  1. यह बुखार कम करने के लिए उपयोग में लाया जाता है।
  2. इसके जड़ से लगे हुए फुले हुए भाग (rhizome) और फूल मिलकर इसको जुकाम, खांसी और हड्डियों के दर्द में राहत देते हैं। इसके राइजोम का जूस एंटीसेप्टिक की तरह काम करता है और शरीर पर बने चोट के नीले निशान दूर करता है।
  3. यह स्वाद में कड़वा होता है इसलिए भूख बढ़ाता है।
  4. फूल का कड़वा स्वाद लिवर के स्वास्थ्य के लिए रामबाण माना गया है।
  5. इसका कड़वा स्वाद और औषधीय गुण मूत्र संक्रमण को दूर करने में सहायक होता है।

अपनी बालकनी में हमने आर्किड कैक्टस या नाईट क्वीन लगाया है और उसके फूलों को उसके पूरे रूप में खुलने का रोमांच का अनुभव किया हैं और यहाँ लिखे देखभाल के टिप्स और चित्र सब मेरे खुद का सुखद अनुभव का सार है।

और उत्तराखंड राज्य का राज्य पुष्प ब्रम्हकमल नीचे दिए चित्र में है जिसको बालकनी में नहीं लगाया जा सकता जैसे कि चित्र के पृष्ठभूमि से ही प्रतीत हो रहा कि इसको चट्टानी सतह और काफी ऊंचाई वाला वातावरण चाहिए। इसलिए आपको इसको देखने और जानने के लिए आपको पहाड़ो पर जाना पड़ेगा।

ब्रम्हकमल

अंत में एक और महत्वपूर्ण बात इन करिष्माई ब्रह्म कमल के बारे में यह भी हैं कि ब्रह्म कमल विलुप्तप्राय प्रजाति का पौधा है क्योंकि एक तो यह ऐसे ही बहुत कम मिलते हैं और जो हैं उनको भी इनके औषधीय गुण के कारण लोग बर्बाद कर देते हैं तो जितना हो सके हम सभी को इसका सरंक्षण करना चाहिए और प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को एन्जॉय करें।

(आशा हैं आपको मेरा यह छोटा सा प्रयास इन फूलों को ब्लॉग के माध्यम से संरक्षित करने का पसंद आएगा। आपके सुझाव भी आमंत्रित हैं।)