होली की यादें – रंगों में घुली बचपन की मिठास
होली की यादें – रंगों में घुली बचपन की मिठास
होली का नाम सुनते ही मन में ढोलक की थाप के साथ फाग गाने के साथ ठंडाई का स्वाद रंगों की बौछार, पिचकारी की धार और गुजिया और लौंगलता की मिठास ताज़ा हो जाती है। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि यादों का खज़ाना है जो हर साल दिल में नई खुशी भर देता है।

बचपन की होली कुछ और ही हुआ करती थी। एक हफ्ते पहले से ही तैयारी शुरू हो जाती थी। बाजार से रंग और पिचकारी लाने की जिद, दोस्तों के साथ योजना बनाना कि किसे पहले रंगना है – यह सब सोचकर ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी। ये अलग बात है की मैं शुरू से ही होली खेलने में कम दिलचस्पी लेती थी और सबको देखकर ही मन ही मन में खुश हो जाने वालों में थी।
होली के एक दिन पहले होलिका दहन हमें बुराई पर अच्छाई की जीत का स्मरण कराती है। आज सुबह ही मैं एक पोस्ट पढ़ रही थी की एक औरत को जलाकर कोई त्यौहार मनाना कहाँ की समझदारी है लेकिन मैं इस पर मैं कहना चाहूंगी की बात यहां स्त्री या पुरुष की नहीं है यहां केवल अच्छाई और बुराई के प्रतीक की है और उस समय भी होलिका अपनी मर्जी से इस दूषित भावना से आग में बैठी थी की वो सही सलामत आग से निकल आएगी और वो नन्हा बालक जो ईश्वर में विश्वास रखता है और उसके अपने भाई का बीटा है वो जल जाएगा। ऐसी भावना के साथ कोई कितनी तरक्की कर सकता है।
खैर यह तो हमेशा ही विवाद का विषय रहेगा और सबके अपने अपने मत भी होंगे। हम वापस अपनी बचपन की यादों में लौटते हैं जहाँ
माँ रसोई में गुजिया, मठरी और दही भल्ले के साथ ही साथ कटहल की सब्जी पूरी और चिप्स पापड़ जो अभी ताज़े ही बनाए गए होते थे सब बनाती थीं। घर में खुशबू फैल जाती थी। पापा समझाते थे कि किसी को जबरदस्ती रंग नहीं लगाना चाहिए, लेकिन शरारतें भी अपनी जगह थीं। कभी कोई रंग से भरी बाल्टी लेकर छत पर खड़ा रहता, तो कोई पीछे से आकर चेहरे पर गुलाल लगा देता।
दोपहर तक पूरा मोहल्ला रंगों से सराबोर हो जाता। पहचान पाना मुश्किल हो जाता कि कौन कौन है। फिर सब मिलकर नाचते-गाते, ढोल की थाप पर झूमते। थककर जब घर लौटते, तो आईने में खुद को देखकर हँसी नहीं रुकती थी।
शाम को नहाकर नए कपड़े पहनना और पहले मंदिर माथा टेकने के बाद बड़ों से आशीर्वाद लेना भी एक खास हिस्सा था। उस समय होली सिर्फ रंगों का खेल नहीं, बल्कि रिश्तों को और मजबूत करने का अवसर लगती थी।
आज बड़े हो गए हैं, जिम्मेदारियाँ बढ़ गई हैं, लेकिन होली की वे यादें आज भी दिल को बचपन में ले जाती हैं। अब रंग थोड़े कम लगते हैं, पर अपनों के साथ बिताया समय ही असली रंग बन जाता है।
होली हमें सिखाती है कि जीवन में कितने भी रंग हों – खुशियों का रंग सबसे गहरा होता है।
आपकी होली की सबसे प्यारी याद क्या है? 🌸