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कोरापुट ,उड़ीसा का स्विट्ज़रलैंड

जानी पहचानी और भीड़ भाड़ वाली जगहों के बारे में तो बहुत लोग बताने वाले मिल जाएंगे लेकिन कई बार मन करता है की इन कोलाहल पूर्ण वातावरण से दूर कही  शांति से अपनी छुट्टियां बीते जाए और सारी थकान और तनाव सब वही छोड़कर आया जाए तो हम आपको इस बार ऐसी ही जगह ले चलते हैं जिसे मैंने अभी फ़िलहाल न सिर्फ आँखों से देखा  पूरी तरह जीया भी यकीन मानिये ये छुट्टी जैसी चाही थी उस से भी ज्यादा खूबसूरत थी तो ज्यादा प्रतीक्षा न करवाते हुए आपको जगह का नाम बता ही देते हैं यह जगह है कोरापुट जो की ओडिशा प्रान्त में पड़ता है और आंध्र प्रदेश और ओडिशा के सीमा से ही लगा हुआ है।

कोरापुट को प्रकृति ने भरभर कर प्यार दिया है और बहुत फुर्सत में तराशा है। शहर के शोर शराबे से दूर बहुत ही सुकून का वातावरण मिला यह आकर। भागदौड़ और तनाव तो कुछ दिन जेहन से एकदम गायब ही हो गया था।

कोरापुट पहुँचने के लिए हमने तो रोड ट्रिप चुनी थी और रोडसाइड प्राकृतिक खूबसूरती और शांत वातावरण का अनुभव बहुत ही सुकून देने वाला था बाकि आप चाहे तो ट्रैन द्वारा कोरापुट सीधे ही बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। हाँ अगर आप हवाई यात्रा करना चाहते हैं तो या तो आपको विशाखापट्टनम उतरकर वहां से ट्रैन या सड़क यात्रा करनी पड़ेगी या तो फिर जयपुर तक भी फ्लाइट जाती है जो कोरापुट से २२ की दुरी पर है। हमने अपनी यात्रा जनवरी में की थी उस समय जब उत्तर भारत एकदम ठंड में कंपकंपा रहा था उस समय यहां का मौसम बहुत खुशनुमा था।
यहां के लोग भी बड़े इत्मीनान से और अपने पारम्परिक तरीके से ही रहते हैं।यही पर एक बड़ा डियर पार्क भी हैं ये दोनों ही जगह जाकर मेरे बच्चे बहुत खुश हुए।

HAL museum

सबसे पहले हमने शुरुआत की कोरापुट से ४० km पहले सिमलीगुड़ा में स्थित HAL
के फेमस संग्रहालय से जोकि बड़ो बच्चो सभी को बहुत आकर्षित और रोमांचित करता है।

चूँकि हम सेमलीगुड़ा ही रुके थे तो वहां से सड़क मार्ग से ही डुडुमा जलप्रपात के लिए निकले रास्ता बहुत ही खूबसूरत था हरे भरे प्राकृतिक वादियों के साथ ही साथ पहाड़ और खेत में तरह तरह के फसल भी देखने को भी मिला। यहां की जनजात्तियाँ अपने घरों और आसपास के जगह को बड़े ही खूबसूरत और सलीके से रखते हैं।

यहां पर हमने एक बड़ी मजेदार चीज देखी यहां प्रवेश द्वार पर सिंह प्रतिमूर्ति रखने का अनोखा रिवाज है।

रानी डुडुमा जलप्रपात

कोरापुट से ४०कम दूर रानी डुडुमा जलप्रपात है जो वास्तव में कला और प्रकृति का अनूठा संगम है। बहुत से जोड़े अपने प्रे वेडिंग सूट के लिए इसको परफेक्ट मानकर अपने जीवन की एक यादगार स्मृति बनांने में व्यस्त थे।

हमने भी कुछ खूबसूरत यादों को अपने यादों के गुल्लक में समेटा और वहाँ से आगे बढ़े।

मत्स्याकुण्ड से निकलकर एक डुडुमा जलप्रपात और मिला जिसको देखकर लगा की ३ तरफ से पहाड़ियां आपस में आलिंगन करते हुए प्रपात निकालने की होड़ में हैं।

वाकई अद्भुत दृश्य था लेकिन रेलिंग लगे होने की वजह से काफी दूर से हमे देख पा रहे थे फिर ध्यान से देखने पर एक थोड़ा जोखिम वाला रास्ता दिखा जो हमे निचे तक ले जाता था वहा पहुंचकर लगा की वाकई यहाँ आना सफल हो गया अगर आप वहां तक जाते हैं तो निचे तक जाने का जोखिम जरूर लीजियेगा वरना कुछ अधूरा ही छूट सकता है।

गुप्तेश्वर महादेव मंदिर

वहां से आगे हम गुप्तेश्वर महादेव मंदिर गए अध्यात्म और प्रकृति का अनूठा संगम है ये। मंदिर में कुछ निर्माण कार्य चल रहा था लेकिन श्रध्द्धालुओं की श्रद्धा में कोई अंतर नहीं था और न ही अंतर् था उनकी तादाद में। यहां का गुप्तेश्वर मंदिर काफी प्रसिद्ध है ऐसी मान्यता है की यहां के शिवलिंग हर साल थोड़े बढ़ते रहते हैं इसलिए इनके दर्शर्नाथ श्रद्धालु बहुत दूर दूर से आते हैं। वही पर गुप्तगंगा के भी दर्शन हुए। साथ ही साथ कुछ जड़ी बूटियां भी दिखी जो सिर्फ वही पाई जाती हैं।

यहां से आगे गुप्त गंगा भी हैं और वहां लोग स्नान का भी आनंद ले रहे थे।

कोलाब डैम

आगे कोलाब डैम भी एक रमणीक स्थल है और वहां एक स्कूल की ट्रिप भी आई थी देखकर अपना स्कूल टाइम याद आ गया  कोलाब डैम के पास में ही काफी अच्छा बगीचा तैयार किया गया है खासकर बच्चो के हिसाब से तो काफी क्रिया कलाप हैं यहां करने के लिए।

देवमाली

देवमाली उड़ीसा का सबसे ऊँचा पॉइंट है इसको भारत का स्विट्ज़रलैंड भी कहते हैं। यहां जाने का रास्ता ही बड़ा घुमावदार और रोमांचक है। अगर आप गाड़ी चलाने के अभ्यस्त नहीं है तो वहां का लोकल ट्रांसपोर्ट लेना ज्यादा अच्छा विकल्प है क्यूंकि टेढ़ी मेढ़ी घुमावदार सड़कें तो अच्छे अच्छों के छक्के छुड़ा दें। गाडी भी एक पॉइंट तक ही जाती है उसके बाद आपको ट्रैकिंग ही करनी पड़ती है। इसलिए अगर आप देवमाली घूमने का प्लान कर रहे तो पूरा दिन लेकर आये और यहां की खूबसूरती का आनंद ले ।

देवघर बाबा वैद्यनाथ

जैसाकि आपको  नाम से ही अंदाज़ा लग गया होगा देवघर  यानि सभी देवी देवताओं का निवास स्थान।

देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से 9वें ज्योतिर्लिंग के रूप में जाना जाता है। ये एकमात्र मंदिर है जहां शिव और शक्ति दोनों एक साथ विराजमान हैं इसलिए इसे शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है।  मान्यताओं के मुताबिक बाबा बैद्यनाथ धाम में ही माता सती का हृदय कटकर गिरा था इसलिए इसे ही हृदयपीठ के रूप में भी जाना जाता है।

जी हां, हम एक नए ब्लॉग के साथ, आपसे जुड़ रहे हैं, जो हमारा अभी  की यात्रा का वृत्तांत है ।

अपनी यात्रा की शुरुआत हमने  दिल्ली से की और रातभर की ट्रैन यात्रा करके हम पहुँचते हैं जसीडीह जंक्शन और वहां से टैक्सी से 10 km और रोड  यात्रा करने के बाद हम पहुँचते हैं देवघर के एक होटल में जहा से बाबा का मंदिर मुश्किल से आधा किलोमीटर ही रह जाता है।

यहाँ पहुंचकर असीम शांति के साथ मन को सुकून देनी वाली बात थी, जसडीह प्लेटफॉर्म की सरंचना जिसकी छवि मैं नीचे संलग्न कर रही हुं जिसको देखने मात्र से ही यह अहसास हो जाता है की हम देव नगरी जहाँ भगवान् भोलेनाथ विराजमान हैं पहुंच गए हैं ।

पौराणिक महत्व

संस्कृत में वैद्य का मतलब चिकित्सक होता है और हमारे कैलाशपति इस उपलब्धि पर भी कब्जा जमाये हुए हैं इसलिए झारखंड में स्थित देवघर को बाबा वैद्यनाथ के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन किवंदती के अनुसार राक्षसराज लंकापति रावण ने एक बार महादेव को खुश करने के लिए घनघोर तपस्या की और अपना सर ९ बार काट कर उनके चरणों में अर्पित किया जब वह दसवीं बार अपना सर काटने चला तो महादेव प्रकट हो गए और वरदान मांगने को कहा साथ ही सभी ९ सर वापस रावण के मस्तक पर विराजमान कर दिया वही से महादेव का नाम वैद्यनाथ पड़ा।


रावण ने वरदान स्वरुप महादेव की प्रतिमा अपने लंका ले जाने की इच्छा व्यक्त की और भोलेनाथ ने इस शर्त पर अनुमति दी की लंका तक जाने के रास्ते में शिवलिंग को कही भी धरती पर स्पर्श न कराया जाये और गलती से भी अगर शिवलिंग धरा पर आए तो वो वहीं विराजमान हो जाएंगें।
ऐसा वरदान पाकर जब लंकापति वहा से प्रस्थान किये तो उन्हें भी ये अंदेशा नहीं था की भोले भंडारी को अपनी इच्छा से कहाँकोई ले जा पाया है।
रास्ते में लघुशंका निवारण के लिए रावण ने शिवलिंग को किसी और को थमाया और भोलेनाथ वही धारा पर विराजमान हो गए और फिर तो राक्षसराज के तमाम प्रयासों के बाद भी वो तस से मस न हुए अंत में रावण ने उनको अपने अंगूठे से दबाकर वहां से प्रस्थान किया। इसलिए देवघर के शिवलिंग जमीन से बहुत कम ही ऊपर हैं उनका ज्यादातर भाग जमीन के अंदर है।

यह धार्मिक स्थल १२ ज्योतिर्लिंग में आता है या नहीं यह विवादित विषय है और कही से भी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं मिलती लेकिन भक्तो की आस्था का केंद्र यह देवस्थान सावन के महीने में बहुत ही भीड़भाड़ वाला स्थान होता है जुलाई और अगस्त के महीने में यहाँ भक्तों का ताँता लगा रहता है। भक्त जन यहां कावरयात्रा लेकर काफी दूर दूर से गंगाजल अर्पित करने आते हैं। देवघर से १०० km दूर सुल्तानगंज में गंगाजी में डुबकी लगाने के पश्चात कांवरियों और भक्तजनों की यात्रा नंगे पाव ही देवघर तक पहुँचते हैं। वैसे देवाघर परिसर में ही एक तालाब है वहां भी भक्तजन नहाकर दर्शन पूजन करते हैं। यहां की शाम की आरती बड़ी मंत्रमुग्धकारी होती है इसमें अवश्य शामिल हों।

  • बाबा बैद्यनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंगम की पूजा सुबह 4:00 बजे शुरू होती है।
  •  सुबह 4:00 बजे से 5:30 बजे तक सरकार पूजा होती है।
  • पूजा अनुष्ठान दोपहर 3:30 बजे तक जारी रहता है, इसके बाद मंदिर बंद हो जाता है।
  • बता दें कि यहां आने वाले लोगों के लिए मंदिर शाम 6:00 बजे तक खुला रहता है और इसके बाद पूजा फिर से शुरू होती है। इस समय मंदिर में श्रृंगार पूजा होती है।
  • इसके बाद मंदिर रात 9 बजे फिर से बंद कर दिया जाता है।

 

पंचशूल

इस मंदिर की एक बड़ी विशेषता है की मंदिर के शीर्ष पर त्रिशूल की जगह पंचशूल स्थित है जिसे सुरक्षाकवच माना गया है यहां के पुरोहित के अनुसार रावण को पंचशूल भेदना आता था जबकि प्रभु राम ने विभीषण की मदद से पंचशूल भेदा था तभी श्री राम और उनकी सेना लंका में प्रवेश पा सकी थी क्यूंकि रावण की लंकापुरी के द्वार पर ही सुरक्षा कवच के रूप में पंचशूल स्थापित था।
इसी सुरक्षा कवच के कारण ही इस मंदिर पर आज तक किसी भी प्राकृतिक विपदा का असर नहीं हुआ।
पंडितों के अनुसार पंचशूल का अर्थ मानव शरीर में मौजूद पांच तत्व क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर, है।

बासुकीनाथ

भगवान भोलेनाथ के दर्शन पूजन के बाद बासुकीनाथ के दर्शन अनिवार्य देवघर में दर्शन पूजन करने के बाद हमने रुख किया बासुकीनाथ का। ऐसी मान्यता है की समुंद्रमंथन के समय बासुकीनाथ को रस्सी की तरह उपयोग में लाया गया था इसलिए है।

ऐसी मान्यता है की बाबा वैद्यनाथ धाम के दर्शन के बाद वासुकीनाथ के दर्शन जरूर करना चाहिए तभी आपके देवदर्शन पूरा होगा।
बाकि आपको मेरा ये ब्लॉग कैसा लगा बताइयेगा जरूर।

तीर्थों का तीर्थ-रामेश्वरम.

आंध्र प्रदेश के भ्रमण के बाद हमने रुख किया और दक्षिण तमिलनाडु की तरफ जहाँ हम पूरे परिवार के साथ पहुँचते हैं रामनाथपुरम क्यूंकि यहां रुककर हमे दर्शन करने हैं हिन्दू धर्म के पवित्रतम चार धामों में एक रामेश्वरम के। ऐसी मान्यता है की भगवान राम ने श्रीलंका पर चढाई करने से पहले अपने हाथों से भगवान भोलेनाथ को यह स्थापित किया था। यह रामेश्वरम द्वीप पर स्थित है जो भारत की मुख्य भूमि से पम्बन जलसंधि द्वारा अलग है। और श्री लंका के मन्नार द्वीप से 40km दूर है। यही रामसेतु का निर्माण हुआ था और धनुषकोड़ी भी यही पर है।अभी कुछ दिनों पहले 22 जनवरी को अयोध्या में भगवन राम के भव्य मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के पहले हमारे प्रधान मंत्री भी रामेश्वरम गए थे और उनकी अग्नि कुंड, 22 कुए में स्नानऔर शिवलिंग दर्शन की बहुत सारी तस्वीरें मीडिया में आयी थी इससे आप इस तीर्थ स्थान का महत्व समझ सकते हैं। तो आइये यात्रा शुरू करते हैं ।

View from Pamban Bridge

पम्बन ब्रिज (Pamban Bridge)

पम्बन ब्रिज (Pamban Bridge), 2.2 कि.मी. लम्बाई वाला पुल, जो रामेश्वरम द्वीप और मुख्य भूमि को जोड़ता है, किसी खाड़ी पर बना हुआ भारत का सबसे लम्बा पुल है। इस प्रकार द्वीप को जोड़ने वाला रेलवे कैंची पुल समुद्र के माध्यम से जहाजों को पार करने के लिए जाना जाता है। अभी नए ब्रिज का कंस्ट्रक्शन पुरे जोरो से चल रहा हैं I ब्रिज को पैदल पार करने का अपना की रोमांच हैं जो वीडियो के माध्यम से महसूस कर सकते हैं

यात्रा को आगे बढ़ाते हुए हम रामेश्वरम पहुंचे । पुराणों में रामेश्वरम् का नाम गंधमादन है। वास्‍तव में, रामेश्‍वर का अर्थ होता है भगवान राम और इस स्‍थान का नाम, भगवान राम के नाम पर ही रखा गया। यहां स्थित प्रसिद्ध रामनाथस्‍वामी मंदिर, भगवान राम को समर्पित है। इस मंदिर में हर साल लाखों श्रद्धालु यात्रा करने आते है और ईश्‍वर का आर्शीवाद लेते है।

रामेश्वरम मंदिर

तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम जिले में स्थित यह रामेश्वरम मंदिर पौराणिक समय में निर्मित खूबसूरत वास्तुकला एवं सुंदर नक्काशी वाला हिंदू धर्म से जुड़ा एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। इस मंदिर की खूबसूरती एवं कलाकृति देखने में काफी ज्यादा अचंभित करने वाली लगती है।

इस मंदिर के दीवारों पर अलग-अलग कलाकृतियों को काफी सुंदर तरीके से नक्काशा गया है। यहां पर जाने के उपरांत आप इस मंदिर के दीवारों पर बने अलग-अलग देवी-देवताओं के प्रतिमाओं के अलावा और भी बहुत सारी खूबसूरत नक्काशी वाली प्रतिमाओं को देख सकते हैं।

इस मंदिर की बड़े गलियारे की लंबाई 3850 फिट है, जो कि दुनिया का सबसे  बड़े गलियारे के रूप में जाना जाता है। इस रामेश्वरम मंदिर के अंदर मुख्य दो लिंग देखा जा सकता है, जिममें एकलिंग भगवान श्री राम एवं सीता के द्वारा स्थापित किया गया था जिसे रामलिंगम के नाम से जाना जाता है। दूसरा हनुमान जी के द्वारा कैलाश से लाए गए शिवलिंग को देखा जा सकता है,

अग्नि तीर्थम 

अग्नितीर्थम सबसे महत्वपूर्ण तीर्थों में से एक है और हर दिन बड़ी संख्या में पर्यटकों द्वारा इसका दौरा किया जाता है। यह  श्री रामनाथस्वामी मंदिर के समुद्र तट पर स्थित है। अग्नितीर्थम मंदिर परिसर के बाहर स्थित एकमात्र तीर्थम है और भारत में 64 पवित्र स्नान में से एक। संस्कृत भाषा में, अग्नि शब्द का अर्थ है अग्नि; जबकि तीर्थम शब्द का अर्थ पवित्र जल होता है। तीर्थम आने वाले भक्त देवता की पूजा करते हैं और पवित्र जल में डुबकी लगाकर अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं।

इस प्राचीन समुद्र तट के तट पर मृत पूर्वजों के लिए समग्र अनुष्ठान किए जाते हैं। पवित्र स्नान करने के इच्छुक तीर्थयात्रियों को पहले यहां डुबकी लगानी चाहिए और फिर रामेश्वरम मंदिर के अंदर स्नान के लिए आगे बढ़ना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस समुद्र में स्नान करने से उसके पापों से मुक्ति मिलती है और वह शुद्ध हो जाता है। अमावस्या और पूर्णिमा के दिन यहां स्नान करना सबसे शुभ माना जाता है। इस स्थान पर रावण को मारने के बाद राम द्वारा अपने पापों के प्रायश्चित की कहानी के बाद, भक्तों ने अग्नितीर्थम के पवित्र जल में डुबकी लगाकर अपने पापों का प्रायश्चित किया।

22 कुंड –

श्री रामेश्वर मन्दिर में परिसर के भीतर ही चौबीस कुँओं का निर्माण कराया गया है, जिनको ‘तीर्थ’ कहा जाता है। इनके जल से स्नान करने का विशेष महत्त्व बताया गया है। इन कुँओं का मीठा जल पीने योग्य भी है। मन्दिर के बाहर भी बहुत से कुएँ बने हुए हैं, किन्तु उन सभी का जल खारा है। मन्दिर-परिसर के भीतर के कुँओं के सम्बन्ध में ऐसी प्रसिद्धि है कि ये कुएं भगवान श्रीराम ने अपने अमोघ बाणों के द्वारा तैयार किये थे। उन्होंने अनेक तीर्थों का जल मँगाकर उन कुँओं में छोड़ा था, जिसके कारण उन कुँओं को आज भी तीर्थ कहा जाता है। उनमें कुछ के नाम इस प्रकार हैं– गंगा, यमुना, गया, शंख, चक्र, कुमुद आदि। श्री रामेश्वरधाम में कुछ अन्य भी दर्शनीय तीर्थ हैं, जिनके नाम हैं– रामतीर्थ, अमृतवाटिका, हनुमान कुण्ड, ब्रह्म हत्या तीर्थ, विभीषण तीर्थ, माधवकुण्ड, सेतुमाधव, नन्दिकेश्वर तथा अष्टलक्ष्मीमण्डप आदि।

सभी २२ तीर्थों में स्नान के पश्चात हमने अपने वस्त्र बदले। हम अपने और अपने परिवार के लोगों के एक एक जोड़ी कपड़े अपने साथ लेकर गए थे। और सूखे और स्वच्छ वस्त्र पहनकर हम मंदिर में लाइन में लग गए वहां हमने देखा ३ तरह की लाइन लगी हुई थी एक लाइन सामान्य भक्तों के लिए दूसरी लाइन उन भक्तों के लिए जिन्होंने १०० रूपये का शुल्क दिया था और तीसरी लाइन उन भक्तों की थी जिन्होंने २०० रूपये का शुल्क दिया था। हम बिना शुल्क वाली लम्बी लाइन में लगकर धीरे धीर बढ़ते हुए आख़िरकार उस क्षण तक पहुँच ही गए जिसकी अभिलाषा लेकर हम दिल्ली से रामेश्वरम की इतनी लम्बी यात्रा किये थे। उस क्षण मनो वक़्त थम सा ही गया था भगवान की अलौकिक छवि हमारे नेत्रों के सामने थी वाकई तीर्थों का राजा कहा जाना चरितार्थ करती है।

भगवान भोलेनाथ के दर्शन उपरांत हम माता पारवती के दर्शन अभिलाषा लिए मंदिर प्रांगण में ही दूसरी तरफ रुख करते हैं और माँ का सौंदर्य तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। सभी जगह दर्शन उपरांत हम अपने होटल गए जहाँ हम अपनी यात्रा के दौरान रुके हुए थे हुए २ घंटे विश्राम करने के पश्चात रामेश्वरम नगर भ्रमण के लिए निकले

और ये कुछ कलाकृतियां हमको इतनी मंत्रमुग्ध कर गई की हम इन्हे बिना ख़रीदे वहां से आगे बढ़ ही नहीं पाए।

अगर आप रामेश्वरम जाते हैं, तो आपको समुद्री जीवों से बनी चीजें जरूर खरीदनी चाहिए। शंख, घोंघे और कस्तूरी कवच की वस्तुएं बहुत सुंदर और सस्ती होती हैं।

रामेश्वरम में और क्या धार्मिक स्थान प्रसिद्ध हैं?

गंधमाधन पर्वतम्

विलुंडी तीर्थम

नंबू नयागियाम्मन मंदिर

जटायु तीर्थम मंदिर

विभीषण मंदिर

यदि आप रामेश्‍वरम में हैं और आपके पास समय हैं तो इन्हे अवश्य देखना चाहिए।

हनुमान मंदिर

रामेश्वरम के दर्शनों के बाद हम लोग पंचमुखी हनुमान – मंदिर पहुंचे जहाँ अखंड ज्योति और एक हनुमान प्रतिमा देखने को मिलती है जिसके बारे में दावा किया जाता है कि यह 700+ वर्ष पुरानी है।

Panchmukhi Hanuman Ji

आपके पास तैरते पत्थर का डेमो दिखाने वाला एक व्यक्ति भी है।म्यू जियम में तैरते हुए पत्थरों को देखने का अवसर मिला जिसको देखकर विज्ञान और आस्था दोनों पर ही विश्वास और दृढ हो गया।

Floating Rock

इतना सब करने के बाद हम निकले अपने अगले पड़ाव धनुष्कोडी की ओर रास्ते में जो समुद्रतटीय दृश्य था वो अत्यंत मनोहारी और आँखों के साथ ही साथ मन को भी सुकून दे रहा था।

धनुष्कोडी

भारत के दक्षिण पूर्वी सिरे पर अंतिम बिंदु पर स्थित धनुषकोडी, रामेश्वरम से एक घंटे से भी कम की ड्राइव पर है। यह वर्तमान में निर्जन है और तीन तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। यह वह स्थान भी है जहां बंगाल की खाड़ी हिंद महासागर में मिलती है। यहां पर्यटकों की थोड़ी भीड़ हो सकती है और पार्किंग क्षेत्र अव्यवस्थित है। समुद्र तट काफी साफ है और पास में एक पुराने ब्रिटिश चर्च और एक रेलवे स्टेशन के खंडहर हैं।

रामेश्वरम की पूरी यात्रा में एक ही कमी रह गयी की हम समय के आभाव और वरिष्ठ  नागरिको के साथ होने के कारण डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के स्मारक संग्रहालय नहीं पहुंच पाए । डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (1931-2015), भारत के 11वें राष्ट्रपति (2002-2007), का जन्म और पालन-पोषण रामेश्वरम में हुआ और वे एक वैज्ञानिक बने और डीआरडीओ और इसरो के लिए काम किया। बच्चों को प्रेरित करने के लिए घूमने लायक अच्छी जगह हैं। इसमें कई पेंटिंग, मॉडल, उनके द्वारा उपयोग की गई वस्तुएं और महान व्यक्ति के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का चित्रण है। समय निकल के अवश्य जाएँ।

इसके बाद हमलोग कन्याकुमारी की तरफ बढ़ने लगे क्यूंकि वहां पहुंचकर हमे वहां का सूर्यास्त और उसके बाद सूर्योदय भी देखना था जो हम अपने अगले ब्लॉग में आपसे साझा करेंगे तब तक के लिए अलविदा। आशा है आपको मेरा यह थोड़ा धार्मिक और प्राकृतिक व्याख्यान से भरपूर ब्लॉग पसंद आया होगा और दी गई जानकारिया आपको भी यात्रा का प्लान करने में मदद करेंगी । आपके सुझाव और प्रशंसा हमारे उत्साह को दुगुना करने का काम करती है। तो अपना बहुमल्य समय और सुझाव ज़रूर दें। धन्यवाद।

जंगल सफारी इन टाइगर पैराडाइस -Jim Corbett National Park

भारत विविधता से भरा हुआ देश है इसकी भूमि क्षेत्र में भी विविधता है कही ज्यादा सुखी भूमि है तो कही अत्यधिक वर्षा युक्त क्षेत्र होने से नमी युक्त भूमि पाई जाती है। इस वजह से जंगली वनस्पतियों में भी विविधता पाई जाती है। भारत विश्व के 17 मेगा जैव विविध क्षेत्रों में से एक है, जिससे वन विविध वनस्पतियों के साथ ही वन जीवों के विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र का समर्थन करते है।

भारत में National Parks या राष्ट्रीय उद्यानों की चर्चा यहां वन्यजीव अभयारण्यों (Wildlife Sanctuaries) के साथ की जाती है। ये जैव विविधता संरक्षण ( biodiversity conservation) के लिए उपयुक्त स्थान हैं। राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य (National Parks and Wildlife Sanctuaries) वन्यजीवों के संरक्षण, वनस्पतियों और जीवों को बचाने और प्राकृतिक पारिस्थितिक संतुलन को बनाये करने के प्राथमिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए सरकार द्वारा घोषित संरक्षित क्षेत्र हैं। भारत में 103 राष्ट्रीय उद्यान और 544 वन्यजीव अभयारण्य हैं। ।मध्य प्रदेश और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सबसे ज्यादा राष्ट्रीय उद्यान (maximum number of National Parks – 9 each) हैं। भारत में राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों में शानदार प्राकृतिक सुंदरता को देखने के लिए हर साल लाखों पर्यटक घूमने आते हैं।

राष्ट्रीय उद्यान 

राष्ट्रीय उद्यान एक ऐसा क्षेत्र है जो वन्यजीवों और जैव विविधता के संरक्षण के लिए strictly reserved होता है। जहाँ विकास, वानिकी, अवैध शिकार, शिकार और खेती या चराई जैसी सभी गतिविधियों पर पाबंदी होती है। सरकार किसी क्षेत्र को तब’ राष्ट्रीय उद्यान के रूप में घोषित कर सकती है जब वह पर्याप्त पारिस्थितिक, भू-आकारिकी (geo-morphological) और प्राकृतिक रूप से महत्वपूर्ण हो। इन पार्कों में, निजी स्वामित्व के अधिकारों की भी अनुमति नहीं है। वे आमतौर पर छोटे वर्ग हैं जो 100 वर्ग किमी से 500 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैले हुए हैं। राष्ट्रीय उद्यानों में  वनस्पतियों या जीवों की प्रजातियों के संरक्षण पर जोर दिया जाता है।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क भारत के सबसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है और असल में, एशिया में बनने वाला पहला राष्ट्रीय उद्यान भी है।।इस राष्ट्रीय पार्क का टाइगर कंज़र्वेशन में अभूतपूर्व योगदान हैं जिसके कारण आज यह विश्व के 60 परसेंटेज टाइगर पापुलेशन का नेचुरल हैबिटैट हैं ।चूंकि बाघ प्रकृति खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर आते हैं, इसलिए इनका संरक्षण उनके क्षेत्र के आसपास वनस्पतियों और जीवों की विविधता को बनाए रखने में मदद करता है।

आज  उत्तराखंड राज्य में स्थित यह पार्क 1318 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और पक्षियों, पौधों और जानवरों की हजारों प्रजातियों का घर है। अगर आप इस वीकेंड कहीं घूमने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो हमारा मानना है कि आपको एक बार जिम कॉर्बेट जरूर घूमने जानना चाहिए। टाइगर जंगल सफारी के अलावा यहां हाथी की सवारी, कैम्पिंग, ट्रैकिंग जैसी एक्टिविटीज का भी मजा लिया जा सकता है। यु तो जानवर चिड़ियाघरों में भी देखे जा सकते हैं पर इन्हे इनके पारम्परिक हैबिटैट में नेचुरल एक्टिविटीज करते देखना बहुत अधिक रोमांचकारी होता हैं। चलिए आपको इस लेख में और जानकारी देते हैं –

जिम कॉर्बेट पार्क के उत्तखण्ड सरकार की ऑनलाइन बुकिंग वेबसाइट उपलब्ध हैं जिससे आप एडवांस बुकिंग कर सकते हैं, क्यूंकि अचानक से वहां पहुँचने पर हो सकता है आपको रुकने के लिए जगह की दिक्कत हो जाए ।

जिम नेशनल कॉर्बेट को ५ ज़ोन्स में बांटा गया है जिनके नाम हियँ बिजरानी, ढिकाला, झिरना, ढेला और दुर्गा देवी जोन पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इन ज़ोन्स को बनाया गया है और जिनके बुकिंग सीजन स्टॉर्ट होने पर काफी जल्दी ही फुल हो जाती हैं । पोखरों जोन नया बना है वहां रुकने के लिए आपको सरकार की ऑनलाइन वेबसाइट पर बुकिंग जल्दी मिल जाएगी लेकिन यह बाहरी इलाके में पड़ता है तो इधर जानवर आसानी से देखने को नहीं मिलते। इसलिए वहाँ जाने से पहले रिसोर्ट की प्री बुकिंग देखसमझकर करें । जंगल सफारी के लिए जीप की भी ऑनलाइन प्री बुकिंग करनी होती है।

जिम कॉर्बेट घूमने जाने का प्लान मौसम देखकर बनाए बहुत ज्यादा ठण्ड और गर्मी में आपको जानवर नहीं दिखेंगे और आप भी घूमने का मजा नहीं ले पाएंगें इसलिए जाने से पहले रिसोर्ट की प्री बुकिंग करते समय वहाँ के मौसम का ध्यान रखे। आमतौर पर  १५ जून से १५ अक्टूबर तक बारिश के मौसम में जिम कॉर्बेट बंद रहता है।

यात्रा से पहले की तैयारी

ट्रिप प्लान करने से पहले कुछ तैयारियां ज़रूर कर ले जैसे जंगल में मच्छर और कीड़े मकोड़े होते हैं तो उस हिसाब से अपनी तैयारी करके जाएँ । साथ ही अपने खाने पीने के कच्चे पदार्थ लेकर जाएं या फिर वहां पर मार्किट जाने के लिए तैयार रहें क्यूंकि जिम कॉर्बेट पार्क में कोई कैंटीन सुविधा नहीं हैं और सपोर्ट स्टाफ आपके राशन से ही खाना त्यार कर के देते हैं । यहाँ गेस्ट हाउस पार्क के काफी अंदर हैं इसलिए मोबाइल नेटवर्क का बहुत इशू रहता हैं पर बाहरी दुनिया से संपर्क काट के कुछ पल अपने लोगो के साथ गुजरना भी यादगार हो जाता हैं।  रिसोर्ट का पावर बैकअप ज़रूर चेक करें क्यूंकि वहाँ पावर कट की समस्या आम बात है। जानवरो को उनके नेचुरल हैबिटैट में डिस्टर्बेंस न हो इसलिए हॉर्न, लाइट और म्यूजिक का शोर मना होता हैं ।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में जंगल सफारी – Jungle Safari in Jim Corbett National Park

जिम कॉर्बेट में जंगल सफारी का आयोजन एक बार सुबह और एक बार शाम को किया जाता है। जिम कॉर्बेट में करने के लिए सभी चीजों में से, यह संभवतः सबसे रोमांचक एक्टिविटी है क्योंकि आप पार्क में टाइगर के साथ साथ कई देशी जानवरों के साथ-साथ विदेशी जानवरों और पक्षी को भी देख सकते हैं। पार्क को चार जोन में बांटा गया है जिसके जरिए आप अपनी सफारी बुक कर सकते हैं। पांच पर्यटन क्षेत्रों में विभाजित, प्रत्येक क्षेत्र में एक निश्चित समय में वाहनों की अनुमति की संख्या पर प्रतिबंध है। जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में दो तरह की सफारी हैं- जीप सफारी और कैंटर सफारी। कैंटर सफारी केवल पार्क के मुख्य क्षेत्र ढिकाला क्षेत्र के लिए उपलब्ध है। इस क्षेत्र में प्रसिद्ध बंगाल टाइगर दिखने की संभावना सबसे अधिक रहती है। प्रत्येक जीप में अधिकतम 6 लोगों को बैठने की अनुमति है, और प्रत्येक क्षेत्र में जीपों की संख्या किसी भी समय एक निश्चित सीमा को पार नहीं कर सकती है। जिम कॉर्बेट में कई प्राइवेट टूर ओपेरटर भी काम करते हैं जो रहने और टाइगर सफारी करना का पैकेज ऑफर करते हैं। टाइगर को उसके घर में सीधे सामने घूमते देखना अविस्मरणीय दृश्य होता हैं पर हमेशा अपने और साथ में अपने परिजनों की सुरक्षा का ध्यान रखे ।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में हाथी सफारी – Elephant Safari in Jim Corbett National Park

 

अगर आपको हाथियों से बेहद प्यार है और आप उनके साथ मस्ती करते हुए जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क की सैर करना चाहते हैं, तो यहां हाथी सफारी सबसे अच्छी चीजों में से एक है। यहां प्रकृति के वन्य जीवन का आनंद घाटियों, नदी के किनारे द्वारा देखा जा सकता है। कई पक्षियों के चहकते, उड़ते हुए – घने जंगलों का लुभावना दृश्य बेहद ही दिल छूने वाला होता है। हाथी सफारी 9 से 10 फीट की सुरक्षित ऊंचाई पर वनभूमि का पता लगाने का सबसे अच्छा तरीका है, जहां से आप स्तनधारियों, सरीसृप जैसे मगरमच्छ, अजगर और पक्षियों की कई प्रजातियों को देख सकते हैं। हाथी की सवारी केवल ढिकाला और बिजरानी क्षेत्रों में उपलब्ध है।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में कॉर्बेट संग्रहालय – Corbett Museum in Jim Corbett National Park

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कॉर्बेट संग्रहालय पूरे राष्ट्रीय उद्यान में सबसे आकर्षक स्थानों में से एक है। संग्रहालय अब उस बंगले में स्थित है जो प्रसिद्ध संरक्षणवादी- जिम कॉर्बेट- का घर हुआ करता था- जिनके नाम पर पार्क का नाम रखा गया है। संग्रहालय उनके संस्मरणों, उनके निजी सामान, उनके द्वारा लिखे गए पत्रों के साथ-साथ उनके मित्रों और शुभचिंतकों, प्राचीन वस्तुओं और दुर्लभ तस्वीरों को प्रदर्शित करता है। यहां एक छोटी सी दुकान स्मृति चिन्ह और हाथ से तैयार की गई स्थानीय वस्तुओं को भी बेचती है जिन्हें कोई भी खरीद सकता है। आप जिम कॉर्बेट, में किए गए काम और जानवरों के लिए एक सुरक्षित और रहने योग्य वातावरण बनाने के उनके प्रयासों से जुड़ी कहानियों को भी जान सकते हैं।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में कैंपिंग – Camping in Jim Corbett National Park

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जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में कैम्पिंग सबसे शांतिपूर्ण गतिविधियों में से एक है, जिसमें पर्यटक यहां आकर इस एक्टिविटी का मजा लें सकते हैं। पार्क एक विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है और पार्क में आकर्षण से जुड़ी कई चीजें मौजूद हैं। हालांकि, कैंपिंग सबसे लोकप्रिय गतिविधियों में से एक है क्योंकि ये अद्वितीय अनुभव प्रदान करता है। आप कैंपिंग पैकेज बुक कर सकते हैं जिसमें नेशनल पार्क में लुभावने जंगलों के माध्यम से मछली पकड़ने, बॉनफायर जैसी चीजें शामिल हैं।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में कॉर्बेट वॉटरफॉल – Corbett Waterfall in Jim Corbett National Park

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जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में एक और चीज जो आपका इंतजार कर रही है, वो है कॉर्बेट वाटरफॉल। यह नैनीताल जाते समय सड़क मार्ग से रामनगर से लगभग 22 से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। घने जंगलों से घिरा और बहुत ही शांत वातावरण प्रदान करने वाला, यह 66 फीट ऊंचा जलप्रपात देखने लायक है, खासकर पूर्णिमा की रातों में। प्रकृति प्रेमी अक्सर इस झरने के पास डेरा डालकर पिकनिक मनाने आते हैं। पर्यटकों को पास से देखने की बजाए दूर से वॉटरफॉल देखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि यहां सांप और मगरमच्छ देखे जाते हैं। सड़क से, आपको इस झरने तक पहुँचने के लिए 2 किमी के छोटे ट्रैक को पूरा करना पड़ेगा।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में रिवर राफ्टिंग – River Rafting in Jim Corbett National Park

अगर आप सोच रहे हैं कि जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में और क्या कर सकते हैं, तो आप यहां रिवर राफ्टिंग का भी मजा ले सकते हैं क्योंकि यह जानवरों और पक्षियों के अलावा पार्क के मुख्य आकर्षणों में से एक है। कोसी नदी पार्क से होकर बहती है और पर्यटकों में रिवर राफ्टिंग करने का सही अवसर प्रदान करती है। इस गतिविधि में भाग लेने का सबसे अच्छा समय मानसून के मौसम के दौरान होता है। नदी का मार्ग आपको जंगलों और पहाड़ियों के बीच ले जाता है, जहां से आप प्रकृति का खूबसूरत नजारा देख सकते हैं। 

जब हम वहाँ गए थे तब जून का महीना था और उत्तर भारत प्रचंड गर्मी में कराह रहा था और साथ ही कराह रहे थे इस नेशनल पार्क के पशु पक्षी और सभी पेड़ पौधे साथ ही बिजली भी अपनी लुंज पुंज दशा में थी। ऐसे में हमें टाइगर तो नहीं दिखा लेकिन फिर भी अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से उबरकर कुछ सुकून के पल और ढेरों खट्टी मीठी यादों के साथ हम वापस आ गए इस उम्मीद में की शायद किसी और प्राणी उद्यान में टाइगर जरूर मिलने का अवसर देगा। आप अपनी अनुभव और संस्मरण हमसे जरूर साझा करें आपके प्यार और सहयोग से हमें बहुत प्रोत्साहन मिलता है

अरकू घाटी: विज़ाग से विजयनगरम के रास्ते

चलिए आज फिर से हमारी दक्षिण यात्रा को आगे बढ़ाते हैं। विशाखापट्टनम के बीचेस का आनंद उठाने के बाद हमने पास के स्थान फेमस बोरा केव्स और आरकू वैली की तरफ किया। विशाखापट्टनम से अरकू के रस्ते में विजयानगरम नाम का बड़ा ही खूबसूरत शहर भी मिला जो पहली बार में राजा कृष्णा देव राय और तेनाली रमा के महशूर किस्सों वाला सुनाई देता हैं पर वास्तव में यह विजयनगर साम्राज्य से अलग, आंध्र प्रदेश का एक बड़ा जिला हैं जो अपने हरे भरे पहाड़ो और शांति मय जीवन के लिए जाना जाता हैं । वैसे तो विजयनगरम में भी कई घूमने की जगह हैं जैसे की विजयनगरम फोर्ट, घंटाघर, पर हमे सब से ज्यादा पसंद आया रामनरायणं मंदिर।
रामनारायणं मंदिर:

यह स्थान अपने आप में एक अनूठी जगह है यह काफी बड़ा पार्क है जो की धनुष के आकार में है जो ऊपर से देखने पर काफी मनमोहक लगता है। इसके अंदर पूरी रामायण कलाकृत्यों में छपी हुई है जो किसी भी मनुष्य को मंत्रमुग्ध कर सकती है और आप इसमें सुध बुध खो सकते हैं। यहां हनुमानजी की बहुत बड़ी प्रतिमा है जिस पर शाम ६ बजे के बाद प्रोजेक्टर के माध्यम से पूरी रामायण दिखाई जाती है या यह कह ले की पवनपुत्र के अद्भुत और रोमांचकारी कारनामे हमारी आँखों के सामने सचित्र वर्णन होता है वो ऐसा लगता है की सब कुछ हमारी आँखों के सामने ही हो रहा है। उसके बाद पवनपुत्र की आरती और प्रसाद का समय होता है।

विजयनगरम में एक प्राचीन रामतीर्थम मंदिर भी हैं, जो एक बहुत ऊंची पहाड़ी पर बना हैं और वह पहुंचने के लिए थोड़ा जयादा समय भी चाहिए। पहाड़ी के नीचे भी एक प्राचीन मंदिर हैं जो उसी नाम से जाना जाता हैं और 7 बहुत सुन्दर मंदिरो का समूह सा हैं।

विजयनगरम से हमने आरकू वैली की यात्रा प्रारम्भ की।

अरकू घाटी

अरकू घाटी विशाखापट्टनम से ४ से ५ घंटे की दुरी पर एक बहुत खूबसूरत घाटी है। जो वाणिज्यिक रूप से बहुत कम उपयोग में लाइ गई है इसलिए ये बहुत कम प्रदूषित है। यहां तक की यहां का रहन सहन बोली भाषा और खान पान सब अपने वास्तविक रूप में ही रह गए हैं या यह कह सकते हैं की जनजातीय रूप में ही पाया जाता है।

बोर्रा गुफा

विशाखापट्टनम से अरकू जाते हुए रस्ते में ही बोर्रा केव्स है उसको जरूर एक्स्प्लोर करियेगा चुना पत्थर की बनी हुई गुफा अंदर से भी उतनी ही खुबसुरत और गुलज़ार रहती है।

अराकू घाटी (Araku Valley) में अनंतगिरी पहाड़ियों के बीच स्थित बोर्रा गुफा देश की सबसे बड़ी गुफाओं में से एक मानी जाती है। यह लगभग 705 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और इसकी खोज 1807 में हुई थी। बोर्रा गुफा कार्स्टिक चूना पत्थर (karstic limestone) से बनी है।

पत्थर की बनी हुई गुफा अंदर से भी उतनी ही खुबसुरत और गुलज़ार रहती है। जगह जगह पर चुना पत्थर से बनी कलाकृतियां आपका मन जरूर मोह लेंगी साथ ही साथ 3 से 4 घंटे का समय और एनर्जी लेकर जाये क्यूंकि गुफा के अंदर बस चलते जाओ चलते जाओ और वापस आने का मन ही नहीं होता। काफी ऊंचाई पर जाने पे एक स्वनिर्मित भगवान भोलेनाथ की मूर्ति है जो आस्था स्वरूप मंदिर का रूप ले ली है।

अरकू घाटी के कॉफ़ी और काली मिर्च के बागान

आरकू वैली एक हिल स्टेशन हैं जो आंध्र प्रदेश के गरम मौसम से राहत दिलाता हैं और अपनी साफ़ मौसम और कुहरे के साथ हलकी ठण्ड के साथ बड़ा ही रोमांटिक माहौल बनाता है ऐसे में यहाँ बड़े बच्चे बूढ़े और नवविवाहित जोड़े सभी के लिए कुछ न कुछ जरूर है।

अरकू घाटी के कॉफ़ी और काली मिर्च के बागान बहुत मशहूर हैं।विशाखापट्टनम से अरकू जाते समय रास्ते में लम्बे लम्बे पेड़ों पर काली मिर्च की बेल लपटी हुई और साथ में कॉफी के पौधे अपने आप में अनूठा संगम बना रहे थे जो अद्भुत नज़ारा था।

साथ ही वहां पर मधुमखी पालन जिसे एपिकल्चर कहते हैं वह भी बहुतायत में देखने को मिला। इसलिए वहां शुद्ध शहद भी मिला।

अरकू घाटी वैसे तो यहां का हिल स्टेशन है। यहां वैसे तो मौसम एक जैसा रहता है न ज्यादा गर्मी न ज्यादा सर्दी लेकिन अरकू घाटी में ठण्ड का मौसम रहता है। इसलिए वहां जाने से पहले अपनी तयारी करके जाएँ। अरकू घाटी में जनजातीय रहन सहन और उनकी जीवनशैली अपनी ओरिजिनल रूप में ही मिलती है। अगर आप चिकेन खाने के शौक़ीन हैं तो यहां बम्बू चिकन  बहुत रोडसाइड दुकाने हैं । बैम्बू के बने हुए क्राफ्ट्स भी बहुत अच्छे मिलते हैं।
यहां घूमने की जगहों में ट्राइबल म्युसियम , छापाराई वॉटरफॉल , पदमपुरम बोटैनिकल गार्डन , चॉक्लेट फैक्ट्री , बोर्रा केव्स और कतिकी वॉटरफॉल है। ज्यादा से ज्यादा २ दिनों में ये पूरा कवर हो जाता है।

छापाराई वॉटरफॉल , 

यह वॉटरफॉल अरकू से 15km की दुरी पर बहुत खूबसूरत जलप्रपात है जिसकी कोई ऊंचाई नहीं है यह नदी द्वारा चुना पत्थरो के कटाव से ही बना है और यहां लोग पिकनिक मानाने के हिसाब से जाते हैं एक्स्ट्रा कपड़े लेकर जाने से आप वह नहा भी सकते हैं और खाने के लिए बम्बू चिकेन और भुट्टा बस  यही ऑप्शन अवेलेबल होगा।

 

ट्राइबल म्युसियम :

ट्राइबल म्युसियम में ट्राइबल रहन सहन खान पान उनके रीती रिवाज़ और उनकी दैनिक जीवन चर्या को बड़ी बारीकी से दर्शाया गया है। सबसे खास बात यहां की यही है की जो भी है सब अपने ओरिजिनल फॉर्म में है लोग जंगल से ही अपनी ज़रूरत की सभी चीजे निकल लेते हैं और ऐसे ही उनकी जीवन शैली चलती रहती है।

हम तो साल के आखिरी दिन पहुंचे थे वहां पर तो वहां काफी रश था और होटल के चार्जेज भी डबल हो गए थे तो आप अपनी ट्रिप प्लान करने से पहले ये ध्यान ज़रूर रखियेगा की पीक टाइम में सभी चीजें पीक पर ही होती हैं। लेकिन इसी आपाधापी में हमे एक बहुत नायब चीज देखनी को मिली बोन फायर के साथ ट्राइबल डांस जिसका एक छोटा सा विडिओ हम आपके लिए भी शेयर क्र रहे।

आरकू वैली bikkers और ओपन कैंपिंग के लिए भी पैराडाइस हैं। कई लोग सिर्फ इसी के लिए आरकू वैली का रुख करते है। पहाड़ो के घुमाओदार रास्ते से होते हुए हर भरे जंगलो से होते हुए नेचर के पास पहुंचने में अलग की शांति और ताज़गी का अनुभव कराती है। इसलिए जब आप भी विशाखापट्टनम की यात्रा का प्लान करे आरकू वैली और उसके आस पास  की जगहों को जरूर शामिल करियेगा।

उम्मीद हैं आपको मेरा यह आरकू वैली का ट्रेवल ब्लॉग पसंद आया होगा। इसको पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद् और आपके सुझाव आमत्रित हैं।

 

 

सिटी ऑफ़ डेस्टिनी, स्टील सिटी-विशाखापट्टनम

विशाखापट्टनम आंध्र प्रदेश की औद्योगिक राजधानी और भारतीय नौसेना का प्रमुख केंद्र होने के साथ ही बड़ा खूबसूरत शहर है जिसको प्रकृति ने बहुत खूबसूरती से तराशा है। यहां एक तरफ तो पहाड़ हैं वही दूसरी तरफ दूर दूर तक समंदर की लहरें अठखेलियां करती सबका मन मोह लेती हैं। समुद्री इलाका होने की वजह से यहां मौसम सम पाया जाता है। तो जब अपना उत्तरी भारत ठंड के कोहरे और बर्फीली हवाओं में ठिठुर रहा था ऐसे समय में हमने रुख किया दक्षिणी भारत की तरफ । हमारी ट्रिप में आंध्र प्रदेश के साथ ही साथ तमिलनाडु और केरल भी शामिल थे तो आज हम आंध्र प्रदेश पर फोकस करते हैं। हमने अपनी यात्रा दिल्ली से शुरू की और लगभग 30 घंटे का ट्रेन सफर करके हम पहुंचे आंध्र प्रदेश के सबसे खूबसूरत और साफ सुथरे शहर विजाग या विशाखापट्टनम।  जो अपनी ग्रीनरी और रोड साइड बने म्यूरल और पेंटिंग्स से बहुत सुन्दर प्रतीत होता हैं और अब तो यह आंध्र प्रदेश की राजधानी भी बन गयी हैं।

विशाखापट्टनम धार्मिक स्थल सिंहचलम मंदिर

यहां घूमने की बहुत सी जगह हैं उसमे हमने चुना यहां के प्रसिद्ध मंदिर सीम्हांचलम को जो भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को प्रदर्शित करता यहां की भव्य कला और संस्कृति को दिखाता अपने आप में अनूठा मंदिर है। भगवान विष्णु को मानने वालो के यह साउथ का बहुत महत्वपुर्ण मंदिर हैं । काफी लम्बी लाइन में लगकर हमने अपनी ट्रिप का पहला आधा दिन मंदिर के नाम किया, मंदिर में बहुत ही शांति थी और लाइन बहुत सिस्टेमैटिक थी कोई धक्का मुक्की नहीं ।

विशाखापट्टनम में सबमैरिन म्यूजियम

चूंकि मेरे साथ मेरे दो छोटे बच्चे भी थे तो उनके इतने लम्बे इंतजार करके मंदिर दर्शन को और मजेदार करते हुए हम उन्हें ले गए कुरसरा पंडब्बी दिखाने और यकीनन बच्चों ने इसको बहुत एंजॉय किया। हालांकि लम्बी लाइन वहां भी थी और बड़ों का ₹70 का टिकट और बच्चों का ₹40 का टिकट लेकर हम अंदर गए तो यकीनन भारतीय नौसेना की जीवनशैली और उनका संघर्ष देखकर मन रोमांच से भर गया हमारे सैनिक हम देशवासियों के लिए हर पल अपने जान पर खेलने को तैयार रहते हैं।

वैसे पनडुब्बी के अलावा पास में ही हवाई जहाज म्यूजियम, फिश म्यूजियम, विक्ट्री अत सी मेमोरियल और कई प्रकार के सुन्दर स्टैटूज़ और कलाकृतिया रोड पर ही त्यार की गई हैं जो देखने के लिए पुरे दिन का घूमना हैं, इसलिए पर्याप्त समय रखे ।

विशाखापट्टनम में फेमस  बीचेस –

विशाखापट्टनम समुद्र के किनारे बसा हुआ शहर है इसलिए यहां बीचों की भरमार है आप चाहे तो दिन भर बीच पर गुजार सकते हैं। कुछ बीच जैसे RK बीच, यारड़ा बीच और राषिकोंडा बीच ये तीनो एक दूसरे से एकदम अलग हैं तो आप इन तीनो को एक्स्प्लोर जरूर करिएगा ।

आपको शायद यह पता न हो की विशाखापट्टनम को पूर्व का गोवा भी कहा जाता है वो सिर्फ इसीलिए की यहां एक से बढ़कर एक शानदार बीच पाए जाते हैं। रोशिकोंडा बीच भी उन्हीं शानदार बीचों में एक है।समुद्री लहरों में नहाने और रोमांचक वाटर स्पोर्ट्स के लिए फेमस हैं ।

Rk बीच यानी रामकृष्ण बीच और यारादा बीच दोनों ही बीच यहां के मस्ट विजिट स्पॉट्स हैं और दोनों बीच एक दूसरे से बिलकुल अलग हैं तो अगर आपने एक बीच देख लिया तो समय बचाने के लिए दूसरे बीच को छोड़ना कहीं से भी समझदारी नहीं है ।

R K बीच में जहाँ सबसे जयादा भीड़ भाड़ होती हैं शाम को तो ऐसा लगता हैं पूरा शहर ही उमड़ पड़ा हैं बीच के किनारे  ।साथ में कई वेज और नॉन वेज स्ट्रीट फ़ूड भी एन्जॉय कर सकते हैं । वही यारड़ा बीच एक अनछुआ बीच हैं जो पहाड़ो से होते हुए पहुचते हैं और तेज लहरों को शांति और कम लोगो के बीच एन्जॉय किया जा सकता हैं ।

 

विशाखापट्टनम में बच्चो को घूमाये इंदिरा गांधी प्राणी उद्यान –

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय प्राणी उद्यान यानी जू तो बच्चों का ऑल टाइम फेवरेट जगह होती है।वहां कुछ अलग जानवर जैसे की जिराफ, सफेद मोर, शुतुरमुर्ग, एमू, ज़ेबरा, रिहनो, वाइट टाइगर, सांप की कुछ प्रजातियां और कछुए का विशाल जन समूह देखने को मिला जिसको देखकर बच्चों में अलग ही उत्साह देखने को मिला।

इस पार्क की खास बात हैं की यहाँ जानवरो की देख भाल काफी अच्छे से की गयी हैं, इसलिए जानवर भी बहुत सवस्थ्य दिखाई देते हैं। और पार्क में आप अपने फोर व्हीलर भी ले जा सकते हैं पर उसका टिकट अलग से लेना होता हैं ।
विशाखापट्टनम आंध्रा प्रदेश की राजधानी है इसलिए इसकी कनेक्टिविटी बहुत अच्छी है आप फ्लाइट,ट्रैन या बस जिससे भी कम्फर्टेबल हों अपनी यात्रा सुनिश्चित कर सकते हैं। वैसे आपके पास समय हो और रस्ते की खूबसूरती को भी एन्जॉय करना हो तो ट्रैन की यात्रा सबसे अच्छी होती है। विशाखापट्टनम विजिट करने के लिए सबसे अच्छा मौसम अक्टूबर से मार्च तक का होता है। गर्मियों में यहां बहुत गर्मी पड़ती है और मानसून के समय यहां घूमने की हिम्मत अडवेंचरस लोग ही कर सकते हैं।वैसे तो विज़ाग में कैलाशगिरि, VUDA पार्क , कम्बलकोण्डा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी, विक्ट्री अत सी मेमोरियल जैसे और भी जगह घूमने के लिए पर हम समय कम होने के कारण नहीं पहुंच सके अगर आप जा पाए तो जरूर जाये ।
मेरे विशाखापट्टनम विजिट डायरी में अभी विजयनगरम और अरकू घाटी भी हैं जो मेरे अगले ब्लॉग में होंगे तो तब तक के लिए आप लोगों से टाटा बाई बाई उम्मीद है आपको मेरा ये ब्लॉग पसंद आया होगा और आपकी ट्रिप प्लानिंग में सहायता करेगा। अपना कीमती समय देने के लिए धन्यवाद।

पहाड़ो की रानी मंसूरी

पहाड़ो की रानी कहे जाने वाली मंसूरी की खूबसूरत वादियों में खोने का मन किसका नहीं होता यह तो वह खूबसूरत सपना है जो सिर्फ भारतीय ही नहीं विदेशी सैलानियों का भी होता है, तो इन या आने वाले छुट्टियों में खासतौर पर गर्मी के मौसम में मंसूरी का प्लान बना ही डालिये और हमे अपने विचार जरूर साझा करिये।
अगर किसी ने मंसूरी या उसके आस पास की यात्रा पहले भी की हो तो वो भी किसी अच्छे रिसोर्ट या होटलस में एक जगह पर रुक कर पहाड़ो को एन्जॉय करना भी पसंद करते हैं। हमे भी मंसूरी की खूबसूरत वादियों में अभी बीती गर्मियों में अपना वक़्त बिताने का मौका मिला और वह अनुभव साझा किये बिना मैं खुद को रोक नहीं पा रही हूं, तो चलिए शुरुआत करते हैं।

मार्च से लेकर जून तक का बेहतरीन समय होता है मंसूरी घूमने का जब नार्थ इंडिया में गर्मी अपने रंग में होती हैं और बच्चे छुट्टी में कही बाहर चलने की ज़िद करने लगते हैं । वैसे तो मंसूरी जाने के लिए दिल्ली से देहरादून तक हवाई मार्ग सबसे जल्दी पहुँचने का आसान रास्ता है । लेकिन हम लोगो ने रास्ते का आनंद लेने के लिए दिल्ली से देहरादून रोड जर्नी से प्लान किया। उत्तरखंड और उत्तर प्रदेश परिवहन की टूरिस्ट बसेस भी अच्छा तरीका हो सकती हैं । देहरादून सेआगे आपको 35 km ही बचते हैं मंसूरी के लिए, लेकिन ये 35 km समतल मार्ग की तुलना में आपको लगभग दुगुना समय लगाएंगे क्यूंकि पूरा रास्ता पहाड़ियों पर गोल गोल घुमाते हुए बीतता है । इसलिए अगर आप ड्राइविंग में एक्सपर्ट नहीं हैं तो कैब कर लेना ज्यादा बढ़िया होता है उससे आप वाक़ई में छुट्टियां रिलैक्सिंग मोड में बिता सकते हैं साथ ही साथ पहाड़ों की खूबसूरती और वहां की शुद्ध हवा एकदम अंदर तक महसूस क्र सकते हैं।

वैसे तो पहाड़ों की खूबसूरती वहां की हरियाली को नजदीक के महसूस करने, शांति का आनंद और सुकून से समय बिताना, वहां का सूर्योदय और सूर्यास्त देखना भी अपने आप में एक खूबसूरत नज़ारा रहता है। बाकि हर शहर के अपने कुछ पॉइंट्स होते हैं जो विजिट के दौरान कवर करना ही होता है। वैसे ही मंसूरी के कुछ पॉइंट्स है लाल टिब्बा, केम्पटी फॉल, जॉर्ज एवेरेस्ट, हांथी पाँव, कंपनी गार्डन जिनका हमने भी अपनी मंसूरी यात्रा में आनंद लिए ।

लाल टिब्बा केवल सीनिक और ट्रेकिंग पॉइंट है वहां से घाटियों का नज़ारा, वहां का सूर्योदय और सूर्यास्त देखना अच्छा अनुभव देता हैं और मंसूरी शहर वालो के ले लिए घूमने हैं मुख्य स्थान भी हैं ।

केम्पटी वाटर फॉल -यह वॉटरफॉल देश के सबसे ऊँचे झरनो में एक है। यह वाटर फॉल दो तीन लेवल या हाइटका है, अगर आप को इत्मीननान से समय देना हो तो पूरा दिन भी दे सकते है, गाड़ी की पार्किंग भी पुरे दिन के हिसाब से ही रहता है। समय के हिसाब से लोग ऊपर या नीचे वाले वाटर फॉल में नहाने का मजा उठाते मिल जायेगे ।

जॉर्ज एवेरेस्ट पीक 3 km ट्रेकिंग का अच्छा ऑप्शन है और सुबह जल्दी शुरुआत करें तो ऊपर पहुंचकर शिवालिक रेंज की सफ़ेद घाटियां बहुत विहंगम नज़ारा देती हैं। जॉर्ज एवेरेस्ट का घर और लेबोरेटरी भी हैं जो आमतौर पर पब्लिक ले लिए बंद होती हैं पर अंग्रेजी इतिहास का प्रतीक जरूर हैं ।

हाथी ताल एक आर्टिफीसियल तालाब बनाया गया हैं जो मंसूरी के रास्ते में ही पड़ता हैं को बोटिंग, वाटर स्पोर्ट्स, एडवेंचर्स स्पोर्ट्स के साथ ही साथ टाइप टाइप के स्नैक्स एन्जॉय करने और समय बिताने और उत्तरखंड की ट्रेडिशनल ड्रेसेस में फोटो खिचवाने का भी अच्छा पॉइंट हैं ।

बर्फ के शौक़ीन लोगो को दिसंबर फेबुरारी में मंसूरी की यात्रा करनी चाहिए जब पूरी पहाड़िया बर्फ की सफ़ेद रंग से कवर हो जाती हैं, हमारी यह यात्रा अभी बाकि हैं ।
अगर आप के पास 5-6 दिन का समय हो तो आस पास के टूरिस्ट प्लेसेस तो भी विजिट कर सकते हैं, जैसे देहरादून, धनोल्टी ।

देहरादून वैसे तो समतल भाग में आता है लेकिन यह भी काफी खूबसूरत जगह है और मंसूरी के रस्ते में ही पड़ता है तो पूरा एक दिन यहां भी बिताया जा सकता है। यहां घूमने लायक स्पॉट्स में सहस्त्रधारा, रॉबर्स केव या गुच्छूपानी साथ ही मालसी डिअर पार्क और देहरादून ज़ू खास हैं।

टपकेश्वर महादेव मंदिर यहाँ का बहुत जाना माना मंदिर है यहां की छत से महादेव शिवलिंग पर बून्द बून्द जल टपकता है यहीं से इस मंदिर का नाम टपकेश्वर पड़ा।

ऐसी मान्यता है की महाभारत काल में यहां गुरु द्रोणाचार्य ने महदेव की तपस्या की थी और महादेव ने खुश होकर उन्हें अश्व्थामा को वरदान के रूप में दिया था। यहां माँ वैष्णो की गुफा भी है साथ ही आसान नदी का किनारा इस जगह को काफी मनोरम बनाता है। भगवान के दर्शन के उपरान्त आप कुछ देर शांति से बैठकर प्रकृति की अद्भुत रचना को महसूस कर सकते हैं।

धनोल्टी में मंसूरी जैसे भीड़ नहीं हैं, सिर्फ सीनिक और प्योर माउंटेन जंगल हैं जिन्हे वह रुक कर महसूस और जिया जा सकता हैं।बस ऐसा लगता हैं की समय यही रुक जाये।

वैसे तो इंटरनेट पर देखने में हिल स्टेशन धनोल्टी, चकराता आसपास  दीखते हैं पर अगर खुद ड्राइव करना हो तो समय लेकर निकले और गाड़ी में ईंधन पर्याप्त मात्रा में हो, साथ ही साथ पहाड़ियों की गोल गोल घुमावदार सिंगल वे ड्राइविंग के लिए तैयार हो तभी और किसी हिल स्टेशन का एडवेंचर का रिस्क ले।

हमे किसी ने बताया की देहरादून से धनोल्टी का रास्ता बहुत बढ़िया है लेकिन हमारा खुद का अनुभव बहुत बढ़िया नहीं रहा छुट्टियों का समय होने की वजह से ट्रैफिक बहुत होने के साथ ही सिंगल लेन और खतरनाक सड़क होने की वजह से बहुत सांस रोककर यात्रा पूरी हुई लेकिन धनोल्टी पहुंचकर वहां इको पॉइंट पर जाकर बड़ा ही सुकून मिला और इतना एडवेंचर करना पूरा वसूल हो गया।

बारिश में हरे भरे पहाड़ और उचाई से गिरते झरने को देखने का अपना रोमांच होता हैं पर उस समय यात्रा करना थोड़ा रिस्की रहता हैं पर अडवेंचरस लोगो को कौन रोक सका हैं ।

लेकिन पहाड़ो में यात्रा में कुछ चीज़े ध्यान में रखने जैसे टायर्स की कंडीशन और हवा ठीक हो, फ्यूल जर्नी के हिसाब से हो, ब्रेक्स की जांच कर ले, लेन में ड्राइव करे, ओवरटेक या ओवरस्पीडिंग से बचे, थोड़ा जरूरी रासन साथ में रखे खासतौर से यदि बच्चे और बड़े बुजुर्ग हो, इंटरनेट न होने की स्तिथि में ऑफलाइन मैप, रात में ड्राइविंग न करनी पड़े इसलिए समय ले कर चले । इन सब से आपकी पहाड़ो पर मंसूरी जैसे जगह की यात्रा सेफ और  यादगार रहेगी । अगर आपने भी मंसूरीकी यात्रा की हो तो अनुभव जरूर शेयर करे और ब्लॉग पर आपके व्यूज आमंत्रित हैं ।

दिल्ली के 10 फेमस पार्क्स जो आपको ज़रूर देखना चाहिए

दिल्ली को बहुत घनी आबादी और हर तरफ कंक्रीट निर्माण की वजह से वौल्ड सिटी भी कहते हैं इसलिए वीकेंड पर सब लोग खुली जगह ढूढ़ते हैं। मेरे दिल्ली भ्रमण के सफर को आगे बढाते हुए आज हम बात करते हैं यहां के कुछ फेमस पार्क्स की।

हिंदुस्तान का दिल कहे जाने वाली दिल्ली में कुछ पल फुर्सत और सुकून से बिताने लायक जगह भी खोजनी पड़ती है जहा जाकर आपके फेफड़े शुद्ध हवा भी ले सके और आपके पॉकेट पर भी भार महसूस न हो। तो हम इस बार कुछ फॅमिली पिकनिक स्पॉट्स जो की हरियाली और शुद्ध हवा में भी प्रचुर हो चर्चा करते हैं।

1.बुद्धा जयंती पार्क

buddha jayanti

दिल्ली के रिज रोड पर पाया जाने वाला यह खूबसूरत पार्क 88 एकड़ में फैला हुआ है। यह काफी साफ सुथरा और वेल मेंटेंड पार्क है। लोग सुबह शाम जॉगिंग, रनिंग और योग के लिए जाया करते हैं दिन में भी यहां काफी चहल पहल रहती है।

जैसा की नाम से ही पता चलता है यहां पर बुद्ध जी की एक प्रतिमा है और उनके आसपास स्तूप और झील देकर माहौल को बौद्धिक बनाया गया है।

2.नेशनल जूलॉजिकल पार्क यानी चिड़ियाघर

 

Delhi zoological park
मथुरा रोड पर प्रगति मैदान में पुराने किले के पास दिल्ली का मशहूर चिड़िया घर है जहाँ विविध प्रकार के पशु पक्षियों के साथ ही हरे भरे वृक्ष से भरा बड़ा सुन्दर वातावरण मिलने वाला है। चिड़ियाघर शुक्रवार को बंद रहता है और यह कुछ प्रवेश शुल्क है जो १२ साल के ऊपर के लोगो के लिए अलग है और 5 साल के बच्चो के लिए यह निःशुल्क है। चिड़ियाघर के बाहर पार्किंग की अच्छी व्यवस्था है और अंदर इ रिक्शा की व्यवस्था है जिसका आपको अलग से शुल्क देना होता है। अंदर आपको अलग अलग सीमा क्षेत्र में अलग अलग तरह के जीव जंतु देखने को मिलेंगे साथ ही आपकी सुरक्षा के लिए गार्ड्स वगैरह की व्यवस्था भी है।

3.इंद्रप्रस्थ पार्क

Stup in Indraprastha Park

इंद्रप्रस्थ पार्क भी दक्षिणी दिल्ली में काफी एरिया कवर किये हुए काफी खूबसूरत पार्क है। यहां भी बौद्ध प्रतिमा और स्तूप के अलावा एम्फीथियेटर भी है। साथ ही साथ है रोज गार्डन और ढेर सारे पेड़ पौधे जो हरियाली के साथ ही मन को भी सुकून देते हैं।

4.सेंसेस पार्क

Beautiful sight at Park

दक्षिणी दिल्ली के साकेत मेट्रो स्टेशन के पास सैयद -उल -उज़्ज़ाब गाओ के पास बदरपुर एरिया में पांच इन्द्रिय उद्यान या ५ सेंसेस पार्क पाया जाता है। 20 एकड़ क्षेत्र में बना यह पार्क २००से भी ज्यादा पेड़ पौधों और २५ से भी ज्यादा मिटटी और पत्थरों की मूर्तियों से घिरा यह बहुत ही आकर्षक पार्क दिल्ली पर्यटन में चार चाँद लगता है। जैसा की नाम से ही पता चलता है यह पार्क शरीर की 5 ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान, नाक, त्वचा, जीभ ) की तृष्णा को समर्पित है। यहाँ का वातावरण इन पांचो इन्द्रियों को किसी हद तक तृप्त करने में सक्षम है।
इस पार्क को दो भागो में बनता गया है मुग़ल गार्डन की तर्ज़ पर बना ख़ास बाग़ और दूसरा छोटे तालाब में उगे कमल और कुमुदिनी जैसे फूलों से सजा नील बाग़।
यह सुबह 9 बजे से शाम को 7 बजे तक खुला रहता है और वयस्क प्रवेश शुल्क Rs35 है।

5.हौज़ खास पार्क

hauz khas

हौज़ खास पार्क दक्षिण दिल्ली का बहुत खूबसूरत और काफी बड़ा पार्क है। इसमें डिअर पार्क, रैबिट पार्क, झील और सीरी फोर्ट की ऐतिहासिक इमारत सबको लेकर एक बहुत स्मरणीय और मस्ट विजिट जगहों में एक है।

6.इंडिया गेट लॉन

india gate lawn

भारत की शान इंडिया गेट तो दिल्ली आने वाले या फिर यहां रहने वाले सभी लोग ही देखने की चाहत रखते हैं और अगर आपके साथ बच्चे भी है तो उनको खेलने के लिए पार्क की भी ज़रूरत होगी। और ऐसे में यह जगह आपको मायूस नहीं करेगी यहां का आसपास काफी हरा भरा और बच्चो के खेलने के अनुरूप है यह सप्ताह में सात दिन सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है। पास में ही राष्ट्रीय युद्ध स्मारक और अमर जवान ज्योति लोगों के दिल को राष्ट्रीय उत्साह के साथ भर देती है

7.नेहरू पार्क

nehru park

अगर आप दिल्ली में ठंडियों में प्रकृति की गोद में रंग बिरंगे फूलों के साथ शांति से कुछ समय बिताना चाहते हैं तो यकीन मानिये चाणक्यपुरी का नेहरू पार्क आपके लिए बेस्ट प्लेस है। सबसे अच्छी बात यह सप्ताह के सात दिन खुला रहता है और बहुत ही सलीके से सजा हुआ साफ़ सुथरा पार्क है।

८० एकड़ में फैला यह पार्क आपको योग, क्रिकेट, फूटबाल कुछ भी खेलने के लिए पर्याप्त है और साथ ही साथ यहां समय समय पर विभिन्न तरह के आयोजन जैसे Jazz fest, Palate fest, NDMC art fest, Maggi fest होता रहता है जोकि आने वाले पर्यटकों को प्रभावित करता है।

8.जहापनाह सिटी फारेस्ट

Entrance at Jahanpanah City Park

दक्षिण दिल्ली के ग्रेटर कैलाश एरिया में काफी घना यह पार्क लगभग 435। एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। दिल्ली के व्यस्ततम जीवनशैली से निकलकर शुद्ध वायु के साथ शांति से बिना किसी शोरगुल के आप यहां अपना समय गुजार सकते हैं। आप चाहे तो फॅमिली पिकनिक या फिर अपना जॉगिंग या रनिंग टाइम यहां एन्जॉय कर सकते हैं साथ ही आपको गिलहरी, मोर जैसे कुछ जीव भी दिख जायेंगे। काफी लोग यहां अपने पालतू कुत्ते भी लेकर आते हैं।

9.वेस्ट टू वंडर पार्क

waste to wonder

पुरानी गाड़ियों के स्क्रैप से बने दुनिया के सात आश्चर्य दिल्ली में देखने के लिए आपको सराय काले खां रेलवे स्टेशन तक जाना होगा उसके बेहद नज़दीक ही यह खूबसूरत पार्क है।

शाम के समय लाइटिंग से इसकी खूबसूरती और बढ़ जाती है और यहां की भीड़ भी बढ़ जाती है। 12 साल से ऊपर के लोगो का Rs50  प्रवेश शुल्क है। 3 साल तक के लोगो का निःशुल्क है और 3 से 12 साल तक के लोगों का Rs 25  प्रवेश शुल्क है।
इस पार्क को देखकर यही समझ आता है इंसान की मेहनत और हुनर से वेस्ट मटेरियल से भी जीवंत रचनाओं को आकार दिया जा सकता है।

10.भारत दर्शन पार्क

bharat bhraman
वेस्ट टू वंडर पार्क की सफलता से प्रेरित यह काफी बड़ा थीम पार्क है यह पार्क भी गाड़ियों के स्क्रैप से बना हुआ है। कोरोना महामारी के दौरान ही तैयार हुआ पार्क दिल्ली की जनता के लिए 2022 का तोहफा माना जा सकता है।

पंजाबी बाग़ में स्थित यह पार्क दिसंबर 2021 के आखिरी सप्ताह में शुरू हो गया है। एक 12 साल से ऊपर के लोगों के लिए दिन का टिकट Rs100 है और शाम को रौशनी में नहाया हुआ वातावरण देखने के लिए आपको Rs150 का टिकट देना होगा। 3 साल तक के बच्चे निःशुल्क यहां घूम सकते हैं 3 से 12 साल तक के बच्चों का Rs75 टिकट लगता है।

इस पार्क की खासियत यह है की आपको यहां पुरे भारत का आकर्षण एक पार्क में ही मिल जाएगा। पार्क के चारों कोनों पर चार धाम दर्शन हो सकता है। साथ ही साथ तमाम आकर्षण जो आप अपने व्यस्त जीवनशैली और अभी कोरोना महामारी की वजह से देखने से चूक गए हों तो यहां आकर आपकी इच्छा पूरी हो सकती है।

घूमने और देखने लायक यहां दिल्ली में काफी कुछ है।सर्दियों से पहले अक्टूबर से नवंबर के मौसम और सर्दियों के बाद फरवरी मार्च के मौसम दिल्ली के पार्कों में  हरियाली और चहचहाते पक्षियों की संगीत का आनंद लेने का सबसे अच्छा समय है। इसलिए दिल्ली के इन आम लेकिन शानदार पार्कों की यात्रा करने के लिए परिवार के साथ कुछ समय निकालें। मेरा यह ब्लॉग एक छोटी सी कोशिश मात्र है मेरे इस प्रयास को आप सबसे सुझाव और प्रोत्साहन अपेक्षित है ।

हरिद्वार या हरद्वार, मायापूरी सब एक

 

Haridwar City at a look

कई बार शहरो की भाग दौड़ की लाइफ में यूँही कभी मन करता हैं कही पहाड़ो में निकल कर कुछ फुर्सत के पल नदी के किनारे आध्यात्म में बिताये । अगर आपके अंदर भी यह वाली फीलिंग जोर मर रही हो आपके लिए हरिद्वार यात्रा आपके लिए धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों लिहाज़ से बूस्टर का काम कर सकता है और बेहतर ऑप्शन नहीं हो सकता हैं खासतौर से अगर आप दिल्ली एनसीआर में रहते हो ।  तो आये आज हम कुछ बाते हरिद्वार की करते हैं । हरिद्वार नाम ही बताता है हरी अर्थात भगवान का द्वार यानि दरवाज़ा मतलब ऐसी जगह जहाँ भगवान खुद आपसे मिलने को तैयार हों। कुछ लोग इसको हरद्वार भी कहते हैं हर मतलब महादेव से है और हरी का मतलब भगवान विष्णु से है भगवन विष्णु का बद्रीनाथ धाम और भोलेनाथ का केदारनाथ जाने का रास्ता यही से होकर जाता है इसलिए इसको हरद्वार या हरिद्वार दोनों में से कुछ भी कहा जा सकता है।

ऐसी मान्यता है की समुद्र मंथन के समय निकले अमृत की कुछ बुँदे प्रयागराज, नासिक, उज्जैन और हरिद्वार में गिर गई थी। भगवान भोलेनाथ ने यही पर माँ गंगा को अपनी जटाओं से मुक्त किया था।
हरिद्वार दिल्ली से लगभग 222 km है और आप अपनी गाड़ी या कैब , टैक्सी से ४ से ५ घंटे लगेंगे। यहां से समीपवर्ती हवाई अड्डा देहरादून हवाई अड्डा है।
हरिद्वार उत्तराखंड बड़ा खूबसूरत शहर है। यह शहर माँ गंगा के किनारे बसा हुआ है अगर आप यहां अपनी गाड़ी से जाने का सोच रहे हैं तो यह बात ध्यान रखने की है यहां टैक्सी स्टैंड शहर से बहार ही है और आपको अपनी गाड़ी वहीं छोड़कर गंगाजी पर बने पूल को पार करके शहर में पहुँच सकते हैं। चूँकि यहां पर्यटक पूरे साल आते रहते हैं इसलिए अपना होटल या गेस्ट हाउसे जहाँ भी रहने का विचार हो पहले से बुक करके यहां जाएँ तो आपको सुविधा रहेगी।
यहां घूमने लायक जगहें

ganga river at haridwar

हरिद्वार में माँ गंगा के घाट मन को सुकून देने वाले हैं। यहां कई घाट हैं जैसे रामघाट, विष्णुघाट, गऊघाट , ब्रम्हकुण्ड या हर की पौड़ी, अस्थि प्रवाह घाट जिसमे हर की पौड़ी बहुत ही मशहूर है। ऐसी मान्यता है की यहां एक डुबकी मारने भर से मानव जीवन सफल हो जाता है। घाट के किनारे पर महिलाओं के लिए वस्त्र बदलने के लिए चेंज रूम भी बने हुए हैं। गंगा जी के किनारे ही छोटे बड़े कई मंदिर भी हैं जहा आप पूजा अर्चना कर सकते हैं। वहां चोटीवाला भोजनालय की पूरी सब्जी और रबड़ी बहुत मशहूर है। वहां की सबसे खासियत यह है की दूध और बाकि पेय पदार्थ कुल्हड़ में प्रस्तुत किया जाता है। जो हमें अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति की झलक दिखाता है। वहां के मार्किट भी काफी आकर्षक और किफायती हैं वहां आपको हेंडीक्राफ्ट, पत्थर और धातु से बने सामान आपको अपने बजट में मिल जाएंगे।

mansa devi mata mandir

माता मनसा देवी, माता चंडी देवी और माया देवी तीनो देवियों का त्रिकोण पूरा करना बड़े ही पुण्य का काम माना जाता है। माता मनसा देवी और माता चंडी देवी दोनों देवियां आमने सामने की पहाड़ियों पर हैं वहां जाने के लिए उड़नखटोला और पैदल दोनों मार्ग है।

आप राजाजी राष्ट्रिय पार्क में जंगल सफारी का आनंद ले सकते हैं। वहां आपको विविध प्रकार के वन्य प्राणी मिल जायेंगे।

यहां के अन्य आकर्षण में दक्ष महादेव मंदिर जो हरिद्वार से ४ km है ऐसी मान्यता है की यह जगह भगवान भोलेनाथ की ससुराल है और यहां माता सती के पिता महाराज दक्ष ने यज्ञ करवाया था और वहां भोलेनाथ को नहीं बुलाया गया था माता सती को अपने पति का अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ और वो उसी यज्ञ कुंड में सती हो गई।
भारत माता को देवी रूप में मंदिर में देखने का सौभाग्य भी आपको हरिद्वार में ही मिलेगा भारत माता मंदिर में

हमारे गरुण पुराण के अनुसार सबसे पवित्र सप्तपुरियाँ हैं अयोध्या, माया(हरिद्वार), मथुरा, कशी, अवंतिका(उज्जैन), कांची, द्वारका। हालाँकि इन सब धार्मिक महत्वताओं के अलावा हरिद्वार प्राकृतिक रूप से बहुत ही खूबसूरत और समृद्ध शहर है। और यहां आकर आपको बड़ा ही सुकून मिलता है।

यहाँ होने वाली 7 बजे की गंगा आरती में ज़रूर जाएँ बड़ा ही अद्भुत नज़ारा होता है उस समय का ।वैसे अभी कोरोना काल में आप दिल्ली से रोडट्रिप का भरपूर लुत्फ़ ले सकते हैं और कुछ बदलाव के साथ खुद को और परिवार को सुरक्षित भी रख सकते हैं।

हरिद्वार को उत्तराखंड के चारों धाम केदारनाथ ,बद्रीनाथ ,गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेश द्वार भी है साथ ही साथ इसके आसपास कई हिल स्टेशन और प्राकृतिक और मनोरम आकर्षण केंद्र भी हैं। तो देर किस बात की है हालात थोड़ा ठीक होते ही आप भी अपना प्लान करिये और अपने अनुभव हमसे जरूर साझा करें। हमे आपके सुझाव और प्रोत्साहन का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा।

दिल्ली-एक भ्रमण राष्ट्रीय राजधानी के 10 ऐतिहासिक स्थल

आज भी लोग अपनी महत्वता बताने के लिए यही बताते हैं की हमारी पहुँच दिल्ली तक है। हिंदुस्तान के दिल कहे जाने वाली दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश होने के साथ ही साथ पूरे भारत देश की शासन का केंद्र भी है। दिल्ली आज से नहीं पीढ़ियों से सत्ता का केंद्रबिंदु रही है यही कारण है की भारत पर राज ज़माने के लिए कई बार दिल्ली को उजाड़ा और बसाया गया । दिल्ली कई बार नष्ट होने के बावजूद हर बार एक नए उत्साह और उमंग से फिर अपनी रौनक बिखेरने लगती है।  इस बनने बिगड़ने की यात्रा के कारण दिल्ली अपने अंदर नवीनता के साथ पुरातत्व को भी समेटे हुए है और इसी विभिन्नता ने इसका पुराई दिल्ली और नई दिल्ली दो तरह का विभाजन अपने आप ही कर दिया।

         

 

यातायात व्यवस्था

राजधानी होने की वजह से यहां से पुरे देश की कनेक्टिविटी बहुत अच्छी है। रेलमार्ग, रोडट्रिप या वायुमार्ग किसी भी तरीके से आप दिल्ली आसानी से पहुँच सकते हैं। दिल्ली के अंदर विश्व प्रसिद्ध मेट्रोट्रैन और मेट्रोबस दोनों की व्यवस्था है जो बजट के साथ ही साथ आपकी सुविधा का ध्यान रखती है।

भारत विविधता में एकता वाला देश कहा जाता है और उसका जीता जागता उदहारण दिल्ली है यहां सभी धर्म के लोग उनको मांनने वाले लोग और उनसे जुड़े धार्मिक स्थल साथ ही साथ तरह तरह के बाजार जिसमे सभी वर्ग के लोग अपने हिसाब से खरीददारी कर सकते हैं।  वैसे तो दिल्ली प्रदूषण में भी पीछे नहीं है लेकिन फिर भी यहां आकर रहने वालों और यहां आकर घूमने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता । खाने पीने के की वैरायटी में भी यह बहुत तरह के ऑप्शन उपलब्ध हैं तो फूडी लोगों के लिए स्ट्रीट फ़ूड में भी दिल्ली वाकई धनी हैं।

राष्ट्रीय धरोहर

यहां घूमने के लिए भी बहुत सारे ऑप्शन उपलब्ध हैं सभी लोगो के पसंद के हिसाब से धार्मिक, पुराने समय के राजा महाराजाओं के किला और महल, बच्चों के लिए पार्क्स, हाट बाजार मेले सब कुछ आपको यहां मिल जाएगा।  आज हम बात करेंगे दिल्ली के मशहूर ऐतिहासिक जगहों की जिनका इसके इतिहास में मुख्य योगदान हैं। तो आइये शुरुआत करते हैं भारत की पार्लियामेंट यानी संसद भवन से ।

1.पार्लियामेंट यानी संसद

parliament

भारत की संसद या पार्लियामेंट देश की सर्वोच्च निकाय है। यह नई दिल्ली में है। यहां राष्ट्रपति दोनों सदनों राजयसभा और लोकसभा को सुचारु रूप से चलाने की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाते हैं।

2.राष्ट्रपति भवन

panorama photo of secretariat building

यह नई दिल्ली में संसद मार्ग पर स्थित है यहां से महज़ ७५० मीटर की दूरी पर राष्ट्रपतिभवन है जो देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति का आवास होता है। सुरक्षा की दृष्टि से इसको सबको देखने नहीं मिलता अगर आपको यह अंदर से जाकर देखना हो तो पहले से ऑनलाइन बुकिंग होती है। इंडिया गेट, वॉर मेमोरियल और प्रधानमंत्री आवास सब इसके आसपास ही है।

राष्ट्रपति भवन में ही एक बड़ा सुन्दर बगीचा है जिसको मुग़ल गार्डन भी कहा जाता है यह फरवरी महीने में आम जनता के लिए खुला होता है आप ऑनलाइन बुकिंग करके यहां जाकर घूम सकते हैं।

3.लाल किला

red fort
मुग़ल वास्तुकला का बड़ा ही नायाब नमूना लालकिला हमारे देश की शान आज भी है। हमारे देश के प्रधानमंत्री १५ अगस्त को झंडा यही फहराते हैं। लाल बलुआ पत्थर से बना यह किला दिल्ली आने वाले हर इंसान की पहली पसंद होती है और सभी लोग इसको ज़रूर देखना चाहते हैं। आपको यहां संग्रहालय भी मिलेगा एवं पारम्परिक हस्तशिल्प और सजावटी सामान आदि यहाँ के मीणा बाजार में आज भी मिलता है ऐसा माना जाता है की मुग़ल शासक अपनी रानियों के लिए ये मीणा बाजार किले के अंदर ही लगवाते थ। ताकि उन्हें अपनी ज़रूरत का हर सामान किले में ही मिल जाये।

4.पुराना किला

purana kila
इस किले का निर्माण मुग़ल राजा शेरशाह सूरी द्वारा १५३८ में करवाया गया था। लगभग 5 मील में फैला यह किला इतिहास और वास्तुकला प्रेमियों के लिए स्वर्ग के सामान है। इसमें नौका विहार की व्यवस्था भी है। यह सप्ताह में सात दिन खुला रहता है और यहां प्रवेश के लिए कुछ शुल्क भी है तो यहां अनावश्यक भीड़ नहीं पाई जाती है।

5.इण्डिया गेट

brown concrete india gate
राष्ट्रपति भवन के पास ही प्रथम विश्व युद्ध के शहीदों की याद में वॉर मेमोरियल बनाया गया है। इस पर शहीदों के नाम भी लिखे हुए हैं। यहां पर जलने वाली अमर जवान ज्योति हमें इस बात की याद दिलाती है की आज हम अपने परिवार के साथ सुरक्षित हैं क्यूंकि हमारी सीमाओं पर न जाने कितने वीर सिपाही सर्दी, गर्मी, बारिश, तूफ़ान की परवाह किये बिना ड्यूटी क्र रहे हैं और न जाने कितने ऐसे ही जांबाज़ वीरगति को प्राप्त हो गए।

6.क़ुतुब मीनार

brown and beige concrete building near green trees
कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाई गई यह ईमारत दिल्ली की खूबसूरती में चार चाँद लगाती है। यह ईरानी वास्तुकला का अनूठा उदहारण है और इसे ूनेस्को विश्व विरासत स्थल में शामिल किया गया है। इसके नज़दीक ही एक लौह स्तम्भ है जिसकी खूबसूरती यह है की इसमें आज तक जंग नहीं लगी जबकि यह एकदम खुले आसमान के नीचे सभी मौसम झेल रहा है।

7.लोधी गार्डन

लोधी पार्क को आज़ादी से पहले लेडी विलिंग्डन पार्क के नाम से जाना जाता था। यह सफदरजंग मकबरे और खान मार्किट के पास स्थित एक रमणीय पर्यटन उद्यान है। इस खूबसूरत लोधी पार्क में सैय्यद शासक मोहम्मद शाह और लोधी वंश के राजा सिकंदर लोधी की कब्रें बनी हुई हैं।
खूबसूरत वातावरण के साथ ही साथ यहां पर सुबह लोधी गार्डन सप्ताह में सातो दिन सुबह ६ बजे से शाम ७ब्ज़े तक खुला रहता है और सबसे खास बात की यहां कोई प्रवेश शुल्क नहीं लगता है। लोधी गार्डन ९०एकड के क्षेत्र में फैला काफी खूबसूरत पार्क है। शाम व्यायाम करने के लिए भी जगह बनी हुई है।

8.जंतर मंतर


संसद मार्ग पर ही नई दिल्ली के कनॉट सर्किल में स्थित एक विशाल वेधशाला है जिसका नाम है जंतर मंतर। वेधशाला प्रयोगशाला को ही कहा जता है। यहां पर समय और स्थान के साथ ग्रह चाल आदि पर पहले के वैज्ञानिक प्रयोग करते थे और आश्चर्य की बात है की तब इतनी तकनीकी ज्ञान नहीं होने के बावजूद उनके निष्कर्ष हमेशा सही रहते थे। ऐसी ही वेधशालाएं आपको जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में भी मिलेंगी।

9.नेहरू तारामंडल


अगर आप बच्चो के साथ दिल्ली घूम रहे हैं तो तीन मूर्ति भवन में बने तारामंडल को देखे बिना आपकी दिल्ली यात्रा पूरी कही ही नहीं जा सकती। हमारे देश के प्रथम प्रधामंत्री की याद में उनकी बेटी और देश की एकलौती महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने विज्ञानं विषय को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस तारा मंडल का निर्माण करवाया था। यहां जाकर ब्रम्हांड, तारों सितारों और खगोलीय घटनाओं से जुडी रोचक जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

10.नेशनल रेल म्यूजियम

यह जगह बड़े, बच्चो सभी को आकर्षित करती है। यह हमारी रेल विरासत के अब तक के सफर को बखूबी सम्हाले हुए है। यहाँ पर आपको सभी तरह के रेल के मॉडल और उनकी कार्य करने की तकनीकी साथ ही बनावट की बारीकियां सभी कुछ मिल जाएगा। साथ ही खिलौना रेल की सवारी भी मन को लुभाती है।

दिल्ली अपने नाम के अनुरूप ही खूबसूरत और विशाल है तो उसका भ्रमण आप एक दिन में नहीं कर सकते वैसे ही एक ब्लॉग में यहां की खूबसूरती कैद नहीं की जा सकती इसलिए यहां के धार्मिक स्थलों और बच्चो के पार्क के बारे में जानने के लिए आपको मेरा अगला ब्लॉग ज़रूर देखना चाहिए।

ऋषिकेश नाम में ही अध्यात्म और रोमांच है।

evening view of Ramjhula

ऋषिकेश उत्तराखंड राज्य के देहरादून जिले का बहुत ही खूबसूरत शहर है जहा से हिमालय की तलहटी शुरू होती है और माँ गंगा अठखेलियां करती सबको अपनी तरफ आकर्षित करती पहाड़ों को छोड़कर मैदानी भाग की यात्रा शुरू करती है। ।

ऋषिकेश नाम कैसे पड़ा

ऐसी मान्यता है की ऋषि रैभ्य ने यहाँ ईश्वर दर्शन के लिए बहुत कठोर तप किया और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु हृषिकेश के रूप में प्रकट हुए।हृषिकेश का मतलब इन्द्रियों को नियंत्रित रखने वाला होता है। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है।

ऋषिकेश जैसा की नाम से ही प्रतीत हो रहा की साधू संतों की नगरी लोग यहां मैडिटेशन और चिल करने आते हैं। यह शहर हरिद्वार से मात्र 24 km है लेकिन यहां के रास्ते दुर्गम और खूबसूरत पहड़ियों से होकर गुजरते हैं। पहाड़ी रास्तों की अपनी अलग ही खूबसूरती है। उन रास्तों में आपको बंदर, हिरन जैसे वन्य जीव भी जगह जगह पर मिल जाएंगें।

कैसे जाएँ :

ऋषिकेश जाने के लिए कनेक्टिविटी बहुत बढ़िया है और आप रेल, फ्लाइट या फिर बस टैक्सी किसी से भी अपनी यात्रा सुचारु रूप से कर सकते हैं।

कब जाये :

वैसे तो पूरे साल पर्यटक यहाँ घूमने जाते हैं लेकिन यहां जाने के लिए अक्टूबर से मार्च का महीना एकदम सही मन जाता है। मानसून के समय यहां जाना थोड़ा खतरनाक माना जाता है।

क्यों जाएँ :

तनावरहित और शांत वातावरण चाहिए साथ में योग और शीतल और साफ़ जल में वाटर राफ्टिंग करनी हो तो ऋषिकेश से बढ़िया जगह आपको मिल ही नहीं सकती। ऋषिकेश को योग कैपिटल ऑफ़ वर्ल्ड  भी बोला जाता है।

परमार्थ आश्रम में योग, मैडिटेशन के लिए आते हैं और एक दो महीने रूककर जाते हैं। यहां शाम की होने वाली आरती वाकई में आपको अध्यात्म का सुख मिलता है।

यहाँ के आसपास के एरिया को स्वर्गाश्रम कहते हैं और यह वाकई में स्वर्ग की अनुभूति देता है की नहीं यह मैं नहीं कह सकती क्युकी मैंने स्वर्ग तो वाकई नहीं देखा लेकिन स्वर्गाश्रम जरूर देखा है और यहां शांति और सुकून बहुत है।

इंग्लैंड का बीटल्स रॉक बैंड महर्षि योगी के आश्रम में भ्रमण करने आए थे तब से मैडिटेशन के क्षेत्र में इसको ज्यादा ख्याति मिली। बीटल्स आश्रम इसी संस्मरण की एक निशानी है ऐसे है न जाने कितने आश्रम यहां मैडिटेशन और योग की हमारी सनातन परम्परा को जीवनदान दिए हुए हैं।

यहां का तेरह मंज़िला मंदिर जिसे त्रयंबकेश्वर मंदिर भी कहा जाता है बाकि मंदिरों से अलग है क्यूंकि यहां पर आपको एक साथ कई देवी देवताओं के दर्शन एक साथ हो जाते हैं साथ ही यह मंदिर अनूठी शिल्पकला का नायाब मिसाल है। तेरह मंज़िल सीढ़ियों के माध्यम से चढ़ने में आपको थोड़ा तकलीफ हो सकती है लेकिन सबसे ऊपर से गंगाजी और शहर का जो विहंगम दृश्य देखने मिलेगा वो आपकी कल्पना से परे होगा।

माँ गंगा के बीच में बनी भगवान भोलेनाथ की योगमुद्रा में बनी मूर्ति अंदर तक शांति का अहसास देने वाली है। यहां से लक्ष्मणझूला और रामझूला ही 1,२ km की दुरी पर पड़ते हैं। वहां आप अपनी गाडी नहीं ले जा सकते आप या तो पैदल या टैक्सी से एक जगह से दूसरे जगह जा सकते हैं। लक्ष्मणझूला के बारे में यह मशहूर है की यहां पर श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण ने केवल २ रस्सियों के सहारे माँ गंगा को पार किया था। लक्ष्मणझूला के ऊपर खड़े होकर आपको नदी के ऊपर झूला झूलने का रोमांच मिलता है उसको शब्दों में बयां करना मुश्किल है आप इसको केवल महसूस ही किया जा सकता है।

ऋषिकेश से 35km की दुरी पर है नीलकंठ महादेव का बहुत ही खूबसूरत और ऐतिहासिक मंदिर है। ऐसा माना जाता है की समुद्र मंथन के समय अमृत के दावेदार तो सभी थे लेकिन विष को देखकर सभी डर गए और ऐसे समय में सिर्फ भगवान भोलेनाथ का सहारा था उनको सबने मिलकर आवाहन किया और भगवान भोलेनाथ ने संसार के कल्याण के लिए हलाहल विष को अपने गले में धारण किया और वहीं से नीलकंठ कहलाए। नीलकंठ महादेव मंदिर इसी ऐतिहासिक तथ्य का गवाह है। ऋषिकेश से नीलकंठ के रस्ते में कई प्राकृतिक झरने है जो काफी लुभावने और शीतल हैं। यहां के जंगलों में कई औषधियां मिलती हैं उसकी वजह से यहां के झरने भी कई औषधियों के गुणों से भरपूर हैं जो कई त्वचा सम्बन्धी और कई बिमारियों से छुटकारा दिलाने में मदद करते हैं।

यह जगह दिल्ली से ह 260 km की दुरी पर है और ऋषिकेश के आसपास और भी कई घूमने की जगह है जो आप अपनी इस ट्रिप के साथ जोड़कर अपनी ट्रिप को यादगार बना सकते हैं। देहरादून, शिवपुरी, चम्बा, देवप्रयाग, धनोल्टी पूरी, लैंसडौन कानाताल ये कुछ ऐसी खास जगह हैं जो ऋषिकेश से 100 से 150 km के दूरी पर हैं और आपके बजट को भी ज्यादा प्रभावित नहीं करेंगे।

अगर आप साहसिक कारनामों में यकीन रखते हैं और खतरों से आपको रोमांचक अनुभूति होती है तो जुंपिन हाइट्स, कौडियाला, ब्यासी कुछ ऐसी जगहों के नाम हैं जो आपके लिए ही बने हैं यहां रिवर राफ्टिंग, कैंपिंग और बोटिंग जैसे करतब होते हैं जो आपकी ट्रिप को रोमांच से भर देंगें।

इतने खूबसूरत और प्रकृति के अनेको खजानो को अपने गर्भ में छिपाये इस शहर के बारे में सबकुछ इस लेख में ही जान लेना वहां जाकर उसकी अनुभूति लेने वालों के साथ अन्याय होगा इसलिए अपनी अगली छुट्टियों में यहां आने का प्लान बनाएं और खुद सुखद अनुभति लें साथ ही अपने अनुभव हमें भी जरूर शेयर करें।

संगमरमरी शहर संस्कारधानी जबलपुर

क्या आपने “धुंआधार “ के बारे में सुना हैं, जहाँ पर पानी की तेज धार सफ़ेद मार्बल पथरो पर गिरने के बाद जोरदार गर्जना के साथ धुँआ धुँआ हो जाता हैं और देखने वाले रोमांचित हो जाते हैं। यह बहुत सुन्दर जल प्रपात भारत के दिल मध्य प्रदेश के संगमरमरी शहर जबलपुर में है ।

Bhedagat Water Fall
“Smoke That Thunders”

यह संस्कारधानी के नाम से भी मशहूर है। पहाड़ों पर बसा यह शहर आदिकाल से ही कई ऋषि मुनियों की तपस्थली रहा है वैसे तो यहां के धुआंधार जलप्रपात की वजह से काफी लोग इस शहर को सभी जानते ही हैं लेकिन हम आज यहां के और भी आकर्षण की बात करेंगें ।

जबलपुर नाम क्यों पड़ा ?

ऐसी मान्यता है की महर्षि जाबालि यहीं निवास करते थे इसलिए इसको पहले जाबालिपुरम कहा जाता था बाद में इसका नाम जबलपुर हो गया। दूसरी मान्यता ये है की इंग्लिश में जबल मतलब टीले या पहाड़। यह शहर पहाड़ों पर ही बसा हुआ है इसलिए ब्रिटिश इसको Jabbalpore बोलते थे जो बाद में जबलपुर हो गया।
जबलपुर को मध्य प्रदेश की न्यायिक राजधानी भी कहा जाता है। मध्य प्रदेश के आग्नेय दिशा के भाग को महाकौशल कहते हैं और जबलपुर महाकौशल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

रमणीक स्थल

नर्मदा नदी के किनारे बसा यह शहर सुबह शाम अपनी नर्मदा आरती के लिए मशहूर है ग्वारी घाट में नर्मदा नदी के किनारे होने वाली आरती में जाकर बड़ा ही सुकून मिलता है जिसको सिर्फ महसूस किया जा सकता है शब्दों में वर्णन हो ही नहीं सकता। भेड़ाघाट के पंचवटी में पूर्ण चाँद के दूधिया प्रकाश में नहाते हुए संगमरमरी पत्थरों की छटा बड़ी ही मनमोहक होती है ऐसे में प्रेम कहानियां बन जाती हैं इस दौरान बोटिंग का लुत्फ़ लेने वालों की भरमार होती है। सुप्रसिद्ध फिल्म अशोका के कुछ भाग इन्हीं मनमोहक दृश्यों का परिणाम हैं।

Puja at Gwarighat
Har Har Narmade

जबलपुर को तालाबों का शहर कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी। ऐसी मान्यता है की इस शहर छोटे बड़े कुल मिलाकर 132 तालाब हैं समय के साथ अभी कुछ तो सुख भी गए हैं लेकिन तब भी आधारताल, मढ़ाताल, हनुमानताल, भंवरताल, रानीताल, सूपाताल, चेरीताल, भानतलैया जैसे और भी नाम आपको इस शहर में मिल जाएंगें वो चाहे तालाब के रूप में मिले या किसी सोसाइटी के रूप मे।

View at Paatbaba Mandir
Peaceful Bliss

त्रिपुरसुन्दरी और चौसठयोगिनी जैसे धार्मिक स्थल की वज़ह से भी जबलपुर जाना जाता है। पाट बाबा भी काफी ऊंचाई पर स्थित मनोरम धार्मिक स्थल है। जबलपुर में कचनार सिटी में भगवन भोलेनाथ की विशाल मूर्ति के दर्शन अवश्य करियेगा साथ ही वहां पर देश के विभिन्न हिस्सों से लाये गए १२ ज्योतिर्लिंगों को प्रदर्शित करते १२ शिवलिंग आपको भक्तिमय माहौल में पहुँचाने के लिए काफी हैं।
यह शहर रानी दुर्गावती की शहादत को अपनी यादों में रखते हुए रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय और संग्रहालय दोनों इन्हीं के नाम पर है।

जनजातीय इतिहास और पुराने शासको के मेमोरी को सम्हाले यहां का संग्रहालय आपको जरूर अपने देश में हुए बाहरी हमलों से हुई क्षति को दर्शाता हुआ अपनी बदहाली के किस्से सुनाएगा।

Rani Durgavati Museum
Relics from Past

मुंबई चौपाटी की याद दिलाती सदर चौपाटी आपको लाजवाब और मुँह में पानी लाने वाले स्ट्रीट फ़ूड के साथ ही खुशनुमा माहौल भी दिखाएगा जो आपकी कॉलेज वाले दिन याद दिला देंगें।

आपको गंजीपुरा, सदर बाजार, गोरखपुर, घंटाघर, बड़ा और छोटा फुहारा मार्किट जैसे इलाके मिलेंगें जो आपको आपके बजट के हिसाब से सामान मुहैया करेंगें। जबलपुर की खोए की बर्फी और कहीं भी आपको नहीं मिलेगी इसलिए इसको जरूर खाकर आएं और जबलपुर जाएँ तो पोहा जलेबी भी अवश्य खाकर लौटें।

Poha & Jalebi
Jabalpur Special-Delicious Poha & Jalebi

यहां के अन्य आकर्षण बैलेंसिंग रॉक्स, भेड़ाघाट में धुआंधार जलप्रपात और उसके थोड़ा आगे नर्मदा नदी में बोटिंग, बरगी डैम, मदन महल फोर्ट, डुमना नेचर रिज़र्व पार्क, पिसनहारी की मढ़िया आदि प्रमुख हैं।

कनेक्टिविटी 

जबलपुर शहर की कनेक्टिविटी काफी अच्छी है पूरे देश में आप कही से भी आप चाहे रेलयात्रा करें या फिर वायुमार्ग का चयन करें साथ ही सड़क मार्ग भी NH30 (Old NH7) द्वारा जुड़ा हुआ है। रेल मार्ग के लिए जबलपुर रेलवे जंक्शन हैं जहाँ हर दिशाओ की ट्रेंने रुका करती हैं। इसके अतिरिक्त वायुमार्ग के लिए डुमना एयरपोर्ट भी हैं जो वर्तमान में मुंबई इंदौर और दिल्ली से हवाई मार्ग से जुड़ा हैं ।

जैव विविधता और हिल स्टेशन

इस शहर के एक खासियत यह भी हैं की मध्य में होने के कारण यहाँ से कई पर्यटन स्थलों तक पंहुचा जा सकता हैं । कान्हा किसली अभ्यारण्य, पेंच नेशनल पार्क जैसे जगह आपको रुडयार्ड किपलिंग की किताब जंगल बुक के एक एक दृश्य की याद दिलाते नज़र आएंगें।

लगभग 250km की दुरी पर यहां का खूबसूरत हिल स्टेशन पचमढ़ी है जिसको देखकर आप अलग ही दुनिया में खो जाएंगें तो जब भी जबलपुर के लिए प्लान बनाये थोड़ा समय निकलकर जाएँ क्यूंकि यहां की प्रकृति ने हीरों के साथ ही साथ बहुत कुछ अपने गर्भ में छिपा रखा है जिसको आप इत्मीनान के साथ ही आत्मसात कर सकते हैं और यकीन मानिये की यह एक सप्ताह आपको कम से कम ६ माह तक पूरे जोश से भागदौड़ की लिए तैयार कर देगी।

मातृ भूमि पर न्योछावर होने वाले वीर सपूतों की ये धरा

मातृ भूमि पर न्योछावर होने वाले वीर सपूतों की ये धरा आजादी के आंदोलन से लेकर अब तक कई इतिहास को समेटे हुए है। देश में पहली बार टाउन हॉल में तिरंगा फहराया गया थागोंड वंश के राजा शंकर शाह और उनके बेटे रघुनाथ शाह ने उस समय अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था, जब बड़ी-बड़ी रियासतें अंग्रेजों के सामने कमजोर साबित हो रही थीं।

तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा जैसे क्रांतिकारी नारे देने वाले नेताजी सुभाषचंद्र बोस अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए हथियार उठाने में भरोसा रखते थे । नेताजी का जबलपुर शहर से खास रिश्ता रहा है और उनसे जुड़ी कई यादें अब भी यहां संजोकर रखी गई हैं। 1931 से 1933 के बीच दो बार यहां के सेंट्रल जेल में रहने से लेकर 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन तक, जिसमें वे कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए, उसके बाद फिर अध्यक्ष पद से इस्तीफा, 1939 में ही नेताजी ने ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन भी किया था।

Photo of Netaji
Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी ने कुल 6 महीने 29 दिन जबलपुर सेंट्रल जेल में गुजारे जिसे आज उनके ही नाम पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस केंद्रीय जेल के नाम से जाना जाता है। केवल नाम ही नहीं, इस जेल में उनकी कई यादें अब भी सुरक्षित रखी हैं। जेल के जिस बैरक में उन्हें रखा गया था, उसे अब एक स्मारक का रूप दे दिया गया है। इस कमरे में कई चीजें मौजूद हैं जिनका इस्तेमाल कैदी के रूप में नेताजी ने किया था। इसमें अनाज पीसने की चक्की से लेकर उन्हें पहनाई गई बेड़ियां तक शामिल हैं। जानकार बताते हैं कि नेताजी जब भी जबलपुर आते थे, वो कुछ समय जबलपुर के तिलवारा घाट पर जरूर बिताते थे।

इसके अतिरिक्त प्रशानिक और रक्षा क्षेत्र में यहाँ स्थित गन कैरिज फैक्ट्री, व्हीकल फैक्ट्री, गन आयरन फॉउंडरी, आर्मी कैंटोनमेंट, वेस्टर्न सेंट्रल रेलवे जोन, कैट ट्रिब्यूनल आदि का अभुत्पुर्ण्य योगदान रहा हैं । शिक्षा के क्षेत्र में जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज, नेताजी सुभाष मेडिकल कॉलेज, रानी दुर्गावती विश्व विद्यालय, होम साइंस कॉलेज, साइंस कॉलेज आदि भी प्रसिद्ध हैं ।

सांस्कृतिक और न्यायिक राजधानी ने काफी कुछ अपने अंदर छिपाया हुआ है जिसके लिए एक ब्लॉग पर्याप्त नहीं है लेकिन फिर भी मैंने गागर में सागर भरने की कोशिश की है। उम्मीद है आपको पसंद आएगा अपने बहुमूल्य सुझाव जरूर दें और अपने व्यस्त समय में से थोड़ा समय निकालकर इसको पढ़ने के लिए धन्यवाद।

नैनीताल:: कुछ पल प्रकृति से गुफ्तगू

उत्तराखंड जिसको देवभूमि भी कहा जाता है वहीं हिमालय की कुमायूँ पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है बड़ा ही रमणीक और प्राकृतिक खूबसूरती से लबरेज़ प्यारी सी जगह नैनीताल

नैनीताल में नैनी शब्द का अर्थ आंखों से है जो नैना देवी शक्तिपीठ से लिया गया है।ऐसी मान्यता है इस जगह पर देवी सती की आँखें गिरी थी और यह 52 शक्ति पीठ में एक है

ताल का मतलब ही जलाशय या झील होता है नैनीताल भी अपनी झील के लिये ही मशहूर है। अगर अपनी भागदौड़ वाली और बोरिंग ज़िन्दगी से राहत कहते हैं और अपने फेफड़ों मेंकुछ ताज़ी हवा भरना  चाहते हैं तो नैनीताल आपके लिए बेस्ट चॉइस है

हमारे पुराणों के अनुसार महाराज प्रजापति दक्ष की पुत्री देवी सती का विवाह महादेव के साथ हुआ था। एक बार महाराज प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ किया उसमें सभी देवी देवताओं और अपने सम्बन्धियों को बुलाया सिवाय भोलेनाथ के यह बात देवी सती को पसंद नहीं आई और इस बात का जवाब मांगने और अपने सम्बन्धियों से मिलने वो स्वयं यज्ञ वाली जगह पहुंची जहाँ उन्होंने अपने पति का अपमान सहन नहीं हुआ और वो उसी यज्ञ की अग्नि में समाहित हो गईं जब शिव शंकर ने यह बात सुनी तो वह बहुत ही गुस्से में वहाँ पहुंचे और देवी सती का मृत शरीर लेकर तांडव शुरू कर दिया  ऐसे में सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए श्री हरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र देवी सती के शरीर को कई भागों में बांट दिया ऐसा करने से देवी सती के शरीर के विभिन्न अंग धरती पर विभिन्न स्थान पर गिर गए। जिन जिन स्थान पर उनके शरीर के अंग गिरे उनको शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है।

नैनीताल के प्रमुख आकर्षण

नैनी झील

सात अलग-अलग पहाड़ों की चोटियों से चारों तरफ से घिरी हुई यह झील कुमायूँ क्षेत्र की सबसे खूबसूरत झील है। इस झील का पानी साल की तीनों ऋतुओं में 3 अलग रंग में दिखाई देता है और ठंड के मौसम में यह सामान्य से गर्म होता है और गर्मी में यह सामान्यतया ठंडा रहता है। यहाँ बोटिंग का एक अपना ही रोमांच है। झील में एक किनारे पर मछलियों का पूरा झुंड ही मिलता है पर्यटक उनको खाने के लिये भी कुछ डालते दिख जाते हैं ।

इको केव गार्डन

संगीत से सराबोर फव्वारों और हैंगिंग गार्डन के लिए प्रसिद्ध यह गुफा 6 छोटी गुफाओं से मिलकर बना हुआ है प्रचलित गुफायें टाइगर केव,पैंथर केव, ऐप्स केव, बैट केव और फ्लाइंग फॉक्स केव है।

नन्दा देवी मंदिर

यहाँ की इष्ट देवी नन्दा देवी हैं और उनका मंदिर झील के किनारे ही है।

हनुमान गढ़ी

यह एक आध्यात्मिक जगह है जो मन को सुकून देती है।

मॉल रोड

यहां पर ताल के दोनों तरफ रोड होने से काफी खुशनुमा से माहौल रहता है। ताल का मल्ला भाग मल्लीताल और नीचला भाग तल्ली ताल कहलाता है।

पंडित वल्लभ पंत ज़ू

काफी ऊंचाई पर और जानवरों को उनके अनुकूल वातावरण मिलने की वजह से यहाँ रहने वाले पशु काफी स्वस्थ और खुश दिखाई देते हैं ।

टिफिन टॉप

चारों तरफ चीड़,ओक व देवदार से घिरी यह जगह मन को एक अलग ही शांति व सुकून देती है। यहाँ से आप पूरा नैनीताल देख सकते हैं।

स्नो व्यू पॉइंट

समुद्र तल से 2270 मीटर ऊँचा यह पॉइंट मन को लुभाने वाले कई दृश्य दे जाता है। अक्टूबर नवंबर के महीने में यह जगह बर्फ से ढंक जाती है यहाँ पहुंचकर ऐसा लगता है कि हाथ ऊपर करके आसमान मुट्ठी में आ सकता है।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क

  यह भारत का सबसे प्राचीन राष्ट्रीय पार्क है । 1936 में बंगाल टाइगर को विलुप्त होने से बचाने के लिए हैली नेशनल पार्क के रूप में स्थापित हुआ बाद में इसके संस्थापक के नाम पर इसको जिम कार्बेट नेशनल पार्क का नाम दे दिया गया। अगर आप दिल्ली से होकर नैनीताल जा रहें हैं तो मुरादाबाद होते हुए रामनगर पहुँचेंगे वहीं यह पार्क है। यहाँ आकर आपको कुछ विलुप्त प्राय पक्षियों और पशुओं को भी देख सकते हैं।

नैनीताल में बारिश में जाएं तो पूरी तैयारी से जाएँ क्योंकि वहाँ सितम्बर अंत तक बारिश और तूफान पूरे जोश में रहते हैं  और बिना तैयारी के जाने पर आपको सबसे पहले छतरी और गर्म कपड़े ही खरीदना पड़ेगा। तो बिना देर किए अपनी अगली छुट्टी नैनीताल में एन्जॉय करें और अपना अनुभव हमसे जरूर साझा करें।

 

 

 

 

 

मानसून के साथ ही बढ़ता सौंदर्य मिर्ज़ापुर का

मिर्ज़ापुर वेबसेरीज़ के 2 सीजन आ चुके हैं और हम में से बहुतों ने ये वेबसेरीज़ देख भी चुकी होगी। इस वेबसेरीज़ पर काफी हंगामा भी हुआ तो कइयों को इसे वास्तविक रूप से देखने का भी मन हो रहा होगा तो जब भी आपको समय मिले देखने की कोशिश जरूर करिएगा। वैसे तो यह स्थान मां विंध्यवासिनी के धाम के रूप में काफी प्रसिद्ध है और जो लोग विंध्याचल आते हैं वो मां अष्टभुजा और माँ काली की कालीखोह भी जाकर दर्शन ज़रूर करते हैं, ऐसी मान्यता है कि यह त्रिकोण पूरा करने से आपका दर्शन सफल हो जाता है।

लेकिन एक बात और है जो मिर्ज़ापुर को और खास बनाता है और वो है यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। मिर्ज़ापुर हमारा पैतृक निवास होने की वजह से हमें तो हमेशा ही लुभाता है आशा है कि आपलोग भी इसके प्राकृतिक सौंदर्य को पास से देखकर खुश होंगे और प्रशासन भी यहाँ तक पहुंचने के रास्तों को सुगम बनाने की तरफ ध्यान दे पाए। तो आज हम मानसून में इसकी सुंदरता बढ़ाने वाले झरनों की बात करते हैं। वैसे तो मिर्ज़ापुर विंध्य क्षेत्र में होने के कारण पहाड़ी क्षेत्र है और इस वजह से बारिश के मौसम में यहाँ जहाँ तहाँ ऐसे ही वाटरफॉल्स बन जाते हैं कुल मिलाकर यहाँ झरनों की संख्या 40 से ऊपर ही होगी लेकिन हम यहाँ उन झरनों की बात कर रहे जो केवल बारिश में ही नहीं बनते अपितु पूरे साल भर इनमें पानी होता है और यह बाँध बनाकर सिंचाई और बिजली उत्पादन जैसे कामों में सहायक भी हैं। तो आइए हम झरनों की यात्रा की शुरुआत करते हैं बहुत ही रमणीय और पर्यटकों का मनपसंद विंढम फॉल से

1. विंढम फॉल

मिर्ज़ापुर से 14km दूर ये वाटरफॉल बहुत ही मनमोहक है। बारिश के मौसम और पर्यटन विभाग और घूमने जाने वालों की लापरवाही की वजह से हो सकता है आपको थोड़ी साफ सफाई की दिक्कत महसूस हो लेकिन प्रकृति ने ज़ी भरकर इसको अपना सौंदर्य दिया है। वीडियो में भी इसकी कल कल करती ध्वनि किसी का भी ध्यान अनायास ही आकर्षित करने वाली है।

2. सिरसी वॉटरफॉल 

मिर्ज़ापुर से घोरावल रोड पर लगभग 45 km बहुत ही मनमोहक और प्राकृतिक छटाओं से भरपूर वाटर फॉल है सिरसी वॉटरफॉल । यह वाराणसी से लगभग 55 km है।

यहाँ पर ऊंचाई से कई जगहों पर से पानी गिरता है और ऐसे में कई झरने एक साथ दिखाई देते हैं जिनको पास से देखने पर यह दृश्य और भी मनमोहक हो जाता है।

सिरसी वाटरफाल सिरसी बांध से गिरता है तो वॉटरफॉल पहुंचने से पहले  आपको यह बांध भी जरूर देखना चाहिए जो बिल्कुल इस तरह दिखता है जैसे कि हम वाकई किसी समंदर के किनारे आ गए हैं जिसका कोई ओर छोर नही हैं।

3. लखनिया हिल्स और वाटरफॉल

 मिर्ज़ापुर जिले में अहरौरा नाम का एक छोटा सा कस्बा है वहीं पर आपको लखनिया वॉटरफॉल मिलेगा जिसकी ऊंचाई लगभग 150 मीटर है । लखनिया वॉटरफॉल के आसपास ही एक एम्यूजमेंट पार्क है जिसका नाम एक्वा जंगल वाटरपार्क एंड रिसोर्ट है जोकि उस क्षेत्र में अपने आप में अनोखा पार्क है जहां बच्चे और बड़े सभी एन्जॉय कर सकते हैं।

4. टांडा फॉल

मिर्ज़ापुर से 7km दक्षिण की ओर जाने पर बहुत ही मनमोहक टांडा वॉटरफॉल है। यह टांडा बांध से होकर गिरता है तो इसमें भी लगभग साल भर ही पानी रहता है। यह मिर्ज़ापुर शहर से सबसे नजदीक है और आसानी से पहुंचा जा सकता है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता देखने के लिए सैलानियों की भीड़ हमेशा ही मिल जाती है।

5. राजदारी और देवदारी वाटरफॉल्स

वाराणसी से लगभग 75 km की दूरी पर चंद्रप्रभा अभ्यारण्य है और वहीं पर चंद्रप्रभा डैम है उसी पर 65 मीटर की ऊंचाई वाला राजदारी वाटरफॉल है और उसके 500मीटर की दूरी पर ही नीचे की तरफ देवदारी वाटर फॉल मिलता है।

राजदारी

6. चुना दरी फॉल

वाराणसी से 44 km की दूरी पर रॉबर्ट्सगंज के रास्ते पर, 24 km चुनार से, मिर्जापुर से 59 km और अहरौरा से 7 km की दूरी पर यह खूबसूरत वॉटरफॉल है। इस वाटरफॉल की सुन्दरता नीचे रखी चट्टानों से देखने से और बढ़िया लगती है जो कि काफी खतरनाक भी है क्योंकि बारिश के मौसम में वह फिसलने लगती है जिससे आए दिन वहाँ दुर्घटना होती रहती है।

7. मुक्खा फॉल

 रॉबर्ट्सगंज घोरावल रोड पर  रॉबर्ट्सगंज से 55 km पश्चिम में और शिवद्वार से 15 km की दूरी पर बहुत ही मनमोहक मूक्खा वाटरफॉल है। शिवद्वार घोरावल से 10 km दूर भगवान शंकर का 11वीं सदी का बना हुआ बड़ा अद्भुत मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि यह अपने आप में एकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान शिव की शिवलिंग पर नहीं उनकी प्रतिमा पर जल अर्पण किया जाता है। यहाँ भगवान शिव और माता पार्वती की काले पत्थर की मूर्ति है।

8. सिद्धनाथ दरी

लखनिया दारी की तरह ही यह वाटरफॉल भी काफी शांति और प्राकृतिक सौंदर्य को अपने अंदर समाहित किये हुए है। यह वॉटरफॉल चुनार में पड़ता है और यह सक्तेशगढ़ में बाबा अड़गड़ानंद के आश्रम से 2 km की दूरी पर ही है। लेकिन यहाँ साल के पूरे 12 महीने पानी नहीं मिलता।

9. कुशियरा फॉल

यह फॉल मिर्ज़ापुर शहर से 38 km की दूरी पर है। यहां पहुंचने के लिए मिर्जापुर से प्रयागराज जाने का शॉर्टकट रास्ता जो कुशियरा जंगल से होकर गैपुरा जाता है उधर से होकर जाना पड़ता है। मिर्ज़ापुर रीवाँ रोड  पर लालगंज से उत्तर दिशा में जाने पर भी यही रोड मिलती है। यह प्रकृति की गोद में छुपा अनमोल तोहफा है यहां के लोगों के लिये और पर्यटकों के लिए भी।

10. खरंजा वाटरफॉल

यह वाटरफॉल मिर्जापुर से 15 km अराउंड बरकछा रोड पर है। विंढम फॉल का पानी खरंजा में जाकर गिरता है और एक वाटरफाल बनाता है। इसका पानी आसपास के एरिया में सिंचाई के काम आता है।

11. जोगिया दरी

यह मिर्ज़ापुर के मड़िहान तहसील से 5 km उत्तर की तरफ जंगल में है। इस फाल की ऊंचाई 300 फ़ीट है, आसपास काफी हरियाली है और काफी रोमांचक दृश्य है। यहाँ तक पहुंचने का रास्ता काफी पथरीला और जंगली है दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आता तो आप अपना समय और वाहन दोनों ही लेकर वहाँ जाएं।

बोकरिया फाल, पेहती की दरी, भैरो कुंड और जल प्रपात काली कुंड और जल प्रपात मेजा रिजर्वायर, जरगो जलाशय जैसे लगभग 40-45 वाटरफॉल्स यहाँ पर और भी हैं जो पिकनिक स्पॉट के साथ ही साथ मिर्ज़ापुर के सौंदर्य को बढ़ाते हैं और प्रशासन यहाँ तक पहुंचने के रास्तों पर और यहां के सौंदर्यीकरण पर ध्यान दे, तो यहाँ का व्यापार और रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है।

आपने गौर किया होगा कि कुछ वाटरफॉल्स सोनभद्र जिले में भी आते है दरअसल 1 अप्रैल 1989 से पहले सोनभद्र और मिर्जापुर दोनों एक ही जिला मिर्ज़ापुर में थे लेकिन बाद में इसकी भौगोलिक विविधताओं और शासकीय काम सुचारू रूप से न चल पाने की वजह से इसे दो ज़िलों सोनभद्र और मिर्ज़ापुर में बांट दिया गया तब से इसके औद्योगिक विकास में काफी गिरावट हो गई पर प्रकृति और देवों का बरसाया प्यार आज भी जिले की खूबसूरती बढ़ा रहा है। तो आपको जब भी मौका मिले मिर्ज़ापुर को नजदीक से ज़रूर देखें और वहाँ की प्राकृतिक और धार्मिक दोनों खूबसूरती को आत्मसात करें साथ ही साथ हमें भी सुझाव और चित्र भेज सकते हैं कि और क्या क्या देखा जा सकता है।

वाराणसी और सारनाथ :: धर्म भी पर्यटन भी

वाराणसी शहर, उत्तर प्रदेश का एक महत्व्पुण जिला है जो दुनिया में सबसे प्राचीन और निरंतर आगे बढ़ने वाले शहरो में से एक है। इस शहर का नाम, वरुणा और असी दो नदियों के संगम पर है। इसको बनारस और काशी के नाम से भी जाना जाता है। तो आइये आज कुछ रोचक बातें वाराणसी शहर की कर लेते हैं ।

Image of ancient Varanasi Ghats

वाराणसी, हिंदू धर्म के सबसे पवित्रतम शहरों में से एक है। इस शहर को लेकर हिंदू धर्म में बड़ी मान्‍यता है कि अगर कोई व्‍यक्ति यहां आकर मर जाता है या काशी में उसका अंतिम सस्‍ंकार हो, तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है यानि उस व्‍यक्ति को जन्‍म और मृत्‍यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। इसीलिए, इस जगह को मुक्ति स्‍थल भी कहा जाता है।

abode at benaras ghat

यहां के मणिकर्णिका घाट पर कई शवों का एकसाथ अंतिम संस्‍कार होते हुए देखा जा सकता है । पहले राख और अस्थियों का विसर्जन गंगा नदी में कर दिया जाता था किंतु अभी नदी को साफ रखने के लिये कुछ सरकारी नियम बने हैं। ऐसा उचित भी हैं क्योंकि वाराणसी के बारे में लोगों का अटूट विश्‍वास है कि यहां बहने वाली पवित्र और निर्मल गंगा नदी में यदि डुबकी लगा ली जाएं तो सारे पाप धुल जाते है। कई पर्यटकों के लिए, गंगा नदी में सूर्योदय और सूर्यास्‍त के समय डुबकी लगाना एक अनोखा और यादगार अनुभव होता है।

Sun dawn sunset at Ganga ghats

वाराणसी शहर का दिलचस्‍प पहलू यहां स्थित कई घाट है और मुख्‍य घाटों पर हर शाम को आरती ( प्रार्थना ) का आयोजन होना है। इन घाटों से सीढि़यों से उतर कर गंगा नदी में नौकाविहार और बोट में आरती देखना पर्यटकों के लिए अविस्यमरिय अनुभव हैं। इन सभी घाटों में से कुछ घाट काफी विख्‍यात हैं जिनमें दशाश्‍वमेध प्रचलित घाट है, यहां हर सुबह और शाम को भव्‍य आरती का आयोजन किया जाता है।

इसके अलावा दरभंगा घाट, हनुमान घाट और मैन मंदिर घाट भी प्रमुख है। यहां के तुलसी घाट, हरिश्‍चंद्र घाट, शिवाला घाट और अत्‍यधिक प्रकाशित केदार घाट भी किसी परिचय के मोहताज नहीं है। यहां के अस्‍सी घाट में सबसे ज्‍यादा होटल और रेस्‍टोरेंट है।

वाराणसी शहर और आसपास के इलाकों में पूरी तरह से धार्मिक रंग में रंगे हुए है और पर्यटन स्थलो क़े रूप में प्रसिध्य है। भगवान शिव, हिंदुओं के प्रमुख देवता है जिन्‍हे सृजन और विनाश का प्रतीक माना जाता है, उन्हीं भगवान शिवं का मुख्य ज्योतिर्लिंग मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में ही हैं । इस शहर को भगवान शिव की नगरी भी कहा जाता है।

काशी विश्‍वनाथ मंदिर के अलावा यहां नया काशी विश्‍वनाथ मंदिर भी है जो वाराणसी के बीएचयू परिसर में बना हुआ है। इसके अलावा, यहां कई उल्‍लेखनीय मंदिर जैसे तुलसी मानस मंदिर और दुर्गा मंदिर भी है।

यहां मुस्लिम धर्म का प्रतिनिधित्‍व करने वाली आलमगीर मस्जिद है जबकि जैन भक्‍त, जैन मंदिर में शांति के लिए जाते है।

सारनाथ

विश्व भर में बौद्ध धर्म के बेहद श्रद्धेय तीर्थस्थलों में एक सारनाथ, वाराणसी से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि निर्वाण प्राप्ति के पश्चात् भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश यहीं पर दिया था, जो महाधर्म चक्र परिवर्तन सूत्र के नाम से पावन स्थली के रूप में विख्यात हुआ। सारनाथ में अनेक भवन बने हुए हैं जैसे धमेख स्तूप व चौखंडी स्तूप, जहां पर भगवान बुद्ध अपने पांच शिष्यों से मिले थे और मुलगंध कुट्टी विहार स्थित है। दुनिया में ऐसे अनेक देश हैं जहां बौद्ध मुख्य धर्म है, उन्होंने अपने देशों की विशिष्ट स्थापत्य शैली में सारनाथ में मंदिर व मठों का निर्माण किया है। यहां के बेहद लोकप्रिय आध्यात्मिक स्थलों में थाई मठ तथा बुद्ध की प्रतिमा भी है, जो चौखंडी स्तूप से दिखाई देते हैं। चौखंडी स्तूप वाराणसी से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह धर्म चक्र स्तूप भी कहलाता है।

पर्यट्क, मंदिर के बाहर हरे-भरे बगीचे में सुकून से बैठकर अथवा ध्यान लगाकर मंदिर से उत्पन्न होने वाले आध्यात्मिक भावों के भवसागर में डुबकी लगा सकते हैं।

सारनाथ में अन्य लोकप्रिय आकर्षणों के अलावा धातु से बना एक स्तंभ भी है, जिसकी स्थापना सम्राट अशोक ने 272-273 ईसा पूर्व में की थी। यह बौद्ध संघ की नींव को चिन्हित करता है। यह स्तंभ 50 मीटर ऊंचा है तथा इसके शिखर पर चार सिंह की मूर्तियां विद्यमान हैं, जो सिंह चतुर्थमुख कहलाती हैं। भारतीय गणराज्य का प्रतीक यही से लिया गया हैं। इन चारों सिंह के नीचे, चार अन्य पशु – बैल, सिंह, हाथी तथा अश्व बने हुए हैं। ये भगवान बुद्ध के जीवन के विभिन्न चरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

सारनाथ जैनियों के 11वें तीर्थंकर की भी जन्मस्थली है, इस कारण से यह स्थल जैनियों के लिए सम्मानजनक माना जाता है।

धार्मिक स्‍थलों के अलावा, वाराणसी में नदी के दूसरी तरफ राम नगर किला है और जंतर – मंतर है जो कि एक वेधशाला है। इस शहर में वाराणसी हिंदू विश्‍वविद्यालय भी स्थित है जिसका परिसर बेहद शांतिपूर्ण वातावरण में बना है। वाराणसी के कुछ आकर्षणों में नया विश्‍वनाथ मंदिर, बटुक भैरव मंदिर, सेंट्रल इंस्‍टीट्यूट ऑफ हाईयर तिब्‍बती स्‍टडी, नेपाली मंदिर, ज्ञान वापी वेल, संकटमोचन हनुमान मंदिर, भारतमाता मंदिर आदि भी हैं।

यह शहर शास्त्रीय संगीत और नृत्य के लिए जाना जाता है। बनारस घराना भारतीय तबला वादन की छह सबसे आम शैलियों में से एक है।

वाराणसी अपने लज़ीज़ स्ट्रीट फूड्स के लिये भी काफी मशहूर है। यहाँ की कचौरी, टमाटर चाट, आलू चाट शुध्द देशी स्टाइल में साथ ही साथ लस्सी और पान का तो जवाब ही नहीं। भारतीय परम्परागत बनारसी साड़ी के बिना शायद ही कोई शादी विवाह सम्पन्न हो पाता हो।

वाराणसी कैसे पहुंचे

वाराणसी तक एयर द्वारा, ट्रेन द्वारा और सड़क मार्ग से आसानी से पहुंच सकते है। वाराणसी सड़क मार्ग वाराणसी के लिए राज्‍य के कई शहरों जैसे – लखनऊ( 8 घंटे ), कानपुर ( 9 घंटे ) और प्रयागराज ( 3 घंटे ) आदि से बसें आसानी से मिल जाती है। वाराणसी की यात्रा बस से करना थोड़ा सा असुविधानजक हो सकता है, रेल या फ्लाइट, वाराणसी जाने का सबसे अच्‍छा साधन है। ट्रेन द्वारा वाराणसी में दो रेलवे जंक्‍शन है : 1) वाराणसी जंक्‍शन और 2) मुगल सराय जंक्‍शन। यह दोनो रेलवे जंक्‍शन शहर से पूर्व की ओर 15 किमी. की दूरी पर स्थित है। नया बनारस रेलवे स्टेशन ( मंडुआडीह रेलवे स्टेशन) भी एक विश्वस्तरीय स्टेशन है, जिसे भारतीय रेलवे (IR) में हवाई अड्डे की शैली में, एक मॉडल रेलवे स्टेशन के रुप मे विकसित किया है । इन रेलवे स्‍टेशनों से दिल्‍ली, आगरा, लखनऊ, मुम्‍बई और कोलकाता के लिए दिन में कई ट्रेन आसानी से मिल जाती है। वाराणसी में लाल-बहादुर शास्त्री अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डा देश के कई शहरों जैसे – दिल्‍ली, लखनऊ, मुम्‍बई, खजुराहो और कोलकाता आदि से सीधी एयर उड़ानों के द्वारा जुड़ा है।

तो अगली बार जब आप परिवार के साथ अपनी अगली यात्रा के बारे में सोचें, तो आध्यात्मिक ज्ञान के साथ फुरसत के समय का आनंद लेने के लिए वाराणसी के पवित्र शहर की यात्रा का विचार करना न भूलें। कृपया पोस्ट के बारे में अपने विचार साझा करें और पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद।


मध्यप्रदेश के 10 झरने जो आपको घूमने से नहीं चूकने चाहिए

मध्यप्रदेश क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है। लेकिन इसकी आबादी कम है क्योंकि इसका अधिकतर भाग जंगल और प्राकृतिक संपदा से भरा हुआ है। यहाँ पहाड़ों पर गुजरते हुए नदियां झरनो (फॉल्स-Waterfall) का रूप ले लेती हैं इसलिए यहाँ फॉल बहुतायत में मिलते हैं। जिनमें से प्रमुख 10 की जानकारी लेकर हम आए हैं अपने इस ब्लॉग के साथ।

विंध्य क्षेत्र से गुजरने वाली टमस नदी जिसको तमसा और टोंस भी कहा जाता है पौराणिक रूप से बहुत मशहूर रही है।ऐसी मान्यता है कि श्री रामचन्द्र वन जाने से पहले अयोध्यावासियों के साथ इसी नदी के किनारे रात गुजारे थे और सुबह सबके उठने से पहले लक्ष्मण और माता सीता के साथ वन के लिए प्रस्थान कर गए थे।

बाद में ऋषि वाल्मीकि ने इसी नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया जहाँ उन्होंने रामायण लिखी और लव और कुश की शिक्षा दीक्षा पूरी हुई।

यही टोंस नदी आगे जाकर बीहड़ नदी में रूपांतरित हुई है और आगे जाकर गंगा नदी में मिल जाती है। इसी नदी पर बहुती फॉल, केवटी फॉल, चाचाई फॉल और पुरवा फॉल के अलावा कई छोटे फॉल भी हैं।

1. बहुती जलप्रपात (Bahuti Water fall) मध्य प्रदेश का सबसे ऊंचा झरना है। इसकी ऊंचाई लगभग 650 फ़ीट है। यह फाल प्रदेश के रीवा जिले में स्थित है जो बीहड़ नदी पर बना हुआ है।बीहड़ नदी तमसा नदी की सहायक नदी है। बहुती जलप्रपात के पास ही चचाई और केवटी जलप्रपात हैं जिससे पर्यटकों को एक बार में ही 3 जलप्रपात देखने का मौका मिल जाता है।

2.केवटी जलप्रपात (Keoti Water fall ) मध्यप्रदेश का तीसरा सबसे ऊंचा जलप्रपात है। इसकी ऊंचाई 322 फ़ीट या 92 मीटर के आसपास है। यह जलप्रपात भी बीहड़ नदी के पानी से ही बनता है। यह रीवा जिले से 46 km दूर चित्रकूट की पहाड़ियों पर है।

इस जलप्रपात की खूबसूरती का अंदाज़ा आप नीचे दिखाया गया वीडियो देखकर लगा सकते हैं।

3.धुआँ धार जलप्रपात (Dhuandhar Waterfall )- यह जलप्रपात मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर से लगभग 30 km दूर भेड़ाघाट क्षेत्र में पड़ता है। यह नर्मदा नदी पर बना हुआ है और इसकी ऊंचाई लगभग 30 मीटर है। इतनी ऊंचाई और अच्छी स्पीड से पानी गिरने की वजह से आसपास धुआँ (Smoke That Thunders) जैसा दिखता है। अभी इसको पर्यटन के हिसाब से विकसित किया गया है और रोपवे और सड़क के दोनों तरफ मार्बल और हास्तशिल्प की दुकानें बनाकर पर्यटकों को लुभाने का प्रयत्न किया गया है। यहाँ खाने के हिसाब से उबले बेर और उबले सिंघाड़े मेरे लिए तो नया एक्सपेरिएंस था।

धुआँ धार फाल देखने का बेस्ट टाइम शरद पूर्णिमा का समय होता है क्योंकि उस समय नर्मदा महोत्सव मनाया जाता है और देश विदेश से लोग इकट्ठे होते हैं। यहाँ आकर नौका विहार और मार्बल शो पीस लेना बिलकुल न भूलें।

4. पांडव जलप्रपात (Pandav Waterfall ) मध्यप्रदेश में केन नदी की एक सहायक नदी द्वारा गिराया गया एवरग्रीन फाल है।

यह फॉल पन्ना जिले में पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के अंदर है और पन्ना से 14 km और खजुराहो से 34 km की डिस्टेंस पर है। इस फॉल की ऊँचाई 30 मीटर के आसपास है।

ऐसी मान्यता है कि पांडव अपने वनवास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यही बिताए थे।

5.बी(मधुमक्खी झरना) (Bee Waterfall ) मध्यप्रदेश के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थल पंचमढ़ी की शोभा बढ़ाने वाला यह जलप्रपात होशंगाबाद जिले में पड़ता है। इसको बी(मधुमक्खी झरना) इसलिए बोलते हैं क्योंकि पहाड़ों से नीचे आते हुए ये मधुमक्खी के आकार जैसा दिखता है।

6. पूर्वा फॉल (Purwa Waterfall)  भी रीवा जिले में टोंस नदी पर ही बना हुआ है। इसकी ऊँचाई 70 मीटर के आसपास है।

यह जगह प्रसिद्ध चित्रकूट पहाड़ियों के नीचे है। इस जगह आने का सबसे अच्छा समय मार्च से मई तक होता है क्योंकि तब ज्यादा गर्मी शुरू नही हुई रहती है।

 

7.गाथा फॉल (Gatha Waterfalls)  भारतीय उपमहाद्वीप में 36th highest फॉल के रूप में जाना जाता है। इसकी ऊँचाई 91 मीटर के आसपास है। यह फॉल मध्यप्रदेश राज्य के पन्ना जिले में केन नदी पर बना हुआ है। वर्षा ऋतु के समय जब नदी अपने उफान पर होती है तब इस फॉल की छटा देखते ही बनती है।

झाँसी रेलवे स्टेशन से 176 km रेल द्वारा ही और आगे तय करने पर पन्ना जिला पहुंचा जा सकता है और पन्ना रेलवे स्टेशन से 12 km और आगे यह फॉल मिलता है। यहाँ से 26 km की दूरी पर खजुराहो हवाई अड्डा भी है।

8.चचाई झरना (Chachai Waterfalls ) मध्यप्रदेश का दूसरा सबसे ऊंचा झरना है इसकी ऊंचाई 430 फ़ीट के आसपास है। यह जलप्रपात भी रीवा जिले में बीहड़ नदी पर बना हुआ है। इसको भारत का नियाग्रा जलप्रपात भी कहते हैं क्योंकि इसकी प्राकृतिक सुंदरता अद्भुत है। चचाई फॉल रीवा से 29 km की दूरी पर है। चचाई से 10 km की दूरी पर सेमरिया तक रेल द्वारा पहुँचा जा सकता है।

 

9.रजत/सिल्वर फॉल (Silver fall /Rajat Pratap Waterfall ) का मतलब हिंदी में चाँदी होता है। इस फॉल से जब पानी गिरता है तो सफ़ेद दूधिया रंग लिए हुए चांदी जैसा प्रतीत होता है। यह फॉल मध्यप्रदेश के सबसे रमणीय पर्वतीय पर्यटक स्थल पचमढ़ी में है जो होशंगाबाद जिले में पड़ता है।

इसकी ऊंचाई 107 मीटर के आसपास है। यह भारत के highest फॉल्स में से एक है। चूंकि यह जंगल में पाया जाता है इसलिए यहाँ भ्रमण के लिये आपको फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट से परमिशन की ज़रूरत पड़ेगी।

10.पाताल पानी जल प्रपात (Patalpani Waterfall) इंदौर मध्यप्रदेश प्रदेश का सबसे बड़ा शहर है और पर्यटन के हिसाब से भी यह काफी महत्वपूर्ण है। इसी शहर के महू। तहसील में पाताल पानी जल प्रपात पड़ता है जिसकी ऊंचाई 300 मीटर के आसपास है। वैसे माना जाता है कि इस झरने के कुंड की गहराई नापी नही गई है और इसका पानी पाताल लोक तक जाता है।

तो आप जब भी कभी मध्यप्रदेश आइये इन प्रपातों को देखना मत भूलियेगा और अपने व्यूज हमें बताना भी बिल्कुल मत भूलियेगा।