दो पल अपने लिए

चाहे कितने ही हो मशरूफ ज़िन्दगी में

दो पल अपने लिए ज़रूर निकालो यारों

बड़ी सुकून देती है वो बालकनी में चाय

अड़ोस पड़ोस या पुराने दोस्तों से हाय

कभी बच्चों के साथ बचपना करना

तो कभी बाग की ताजी हवा फेफड़ों में भरना

कुछ ऐसे अरमान जो आँखों में रह गए

या फिर विदाई के संग आंसुओं में बह गए

हो ज़िंदा इस बात को बनाए रखना

कभी सोकर तो कभी जगके सपने बनाए रखना

ज़िंदगी में चाहे कितने भी हो गम

चाहे उस पर लगानी पड़े खुद ही मरहम

जगी या फिर सोई हुई आँखों से देखे हुए ख्वाब

सबका तुम्हे देना है खुद को जवाब

 

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