रामतीर्थम और रामायणं भीमली ; एक रोमांचक और आध्यात्मिक अनुभव

रामतीर्थम 

यह मंत्रमुग्ध करने वाली खूबसूरत तस्वीर  हमारा वह इनाम है जो हमने बोद्धिकोण्डा की विशालकाय पहाड़ी को चढ़कर अर्जित की है और यकीन मानिये सारी थकान और दुःख दर्द एक साथ गायब हो गए जब पहाड़ी के ऊपर से यह नज़ारा देखा।

 

भारत के आंध्र प्रदेश प्रान्त के विजयनगरम डिस्ट्रिक्ट में नेल्लिमर्ला मंडल में एक पंचायत है रामतीर्थम यह दृश्य वहीं का है।

. यह विजयनगरम से १२ km दूर है। यहां बोद्धिकोण्डा नाम की विशाल चट्टानी पहाड़ी है और उसी पहाड़ी पर रामतीर्थम नाम का बहुत खूबसूरत मंदिर है जहाँ भगवान श्रीराम माता जानकी और अपने अनुज लक्ष्मण के साथ साक्षात् विराजमान हैं। वह तक पहुँचने के लिए आपको लगभग 600 सीढ़ियों के साथ ही साथ पहाड़ी रास्ते की रोमांचक चढ़ाई करनी होगी। अगर आप ट्रैकिंग के शौक़ीन हैं तो यकीन मानिये ये जगह आप ही के लिए है और आप एक सुखद और शानदार अनुभव लेकर वहां से लौटने वाले हैं।

सीढ़ियों के अलावा खड़ी पहाड़ी वाला ऐसा भी रास्ता है जैसा नीचे सलग्न है इसलिए अगर आप ट्रेकिंग का सोच रहे हैं तो आधा दिन का समय लेकर आएं साथ ही साथ कोशिश करें की या तो सुबह या दोपहर के बाद का समय चुने क्यूंकि धुप में चढ़ाई मुश्किल हो जाती है और शाम 5 बजे मंदिर बंद हो जाता है और पुजारी जी जो शायद आसपास के गांव के ही हैं वो भी हमारे साथ ही वापस आ गए थे।


ऐसी मान्यता है की पांडवा अपने वनवास के समय यहां अपना समय बिताये थे और श्रीराम प्रभु की मूर्ति उन्होंने ही यहां स्थापित की थी जब भगवान कृष्ण किसी कारणवश उनके साथ न आ सके।

तीर्थम का मतलब पानी में डूबी हुई वस्तु होता है ऐसा माना जाता है की मंदिर में रखी हुई मूर्ति यहां के राजा को पानी में डूबी हुई मिली थी। यहां बौद्ध और जैन समुदाय के धार्मिक स्थल भी हैं

रामनरायणं मंदिर


विशाखापट्टनम से लगभग 50km दूर और विजयनगरम से 7km
दूर एक बहुत ही अद्भुत मंदिर है जो भगवान श्रीराम के धनुष बाण के आकर में ही है जो हमे अपने पूर्वजों और अपने सनातन धर्म की याद दिलाता है। बाण के अग्रिम भाग पर पवनसुत की विशाल संगमरमरी प्रतिमा उनके रामायण में अतुलनीय योगदान को दर्शाता है। इसी संगमरमरी प्रतिमा पर प्रोजेक्टर से पूरा रामायण वर्णन तेलुगु और हिंदी दोनों में बारी बारी से  सचित्र वर्णन यहां का मुख्य आकर्षण है साथ ही साथ यह बहुत बड़े प्रांगण में बना हुआ है।

यहां की दीवारों पर भी रामायण काल का सचित्र वर्णन है और देखकर ऐसा लगता है की सब कुछ हमारे आँखों के सामने घटित हो रहा है।

यहां आकर आध्यात्मिक और मानसिक सुकून दोनों मिला और सही मायने में छुट्टियां यही बिताई हमने। प्रांगण में मंत्रोचारण और धुप बत्ती की खुशबु वाकई रिलैक्सिंग ही थी। साथ ही श्री हरी विष्णु की विश्राम अवस्था की मूर्ति एकदम सजीव ही जान पड़ रही थी। इसको केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर से लिया गया है।

हम तो जब भी इधर आये अपने आपको यहां आने से रोक ही नहीं पाए। यह पंचमुखी पवनसुत की महिमा कहे या मेरे मन की शांति पाने की ललक जो मुझे यहां हर बार बरबस ही खींच लाती है ये मै यकीन के साथ नहीं कह सकती लेकिन यहां के प्रवास में यहां आना तय हैं और आज ये चौथी बार है।

भीमली

विशाखापट्टनम से 44 कि.मी की दूरी पर स्थित भीमुनीपट्टनम एक खूबसूरत शहर है, जो भीमली के नाम से भी जाना जाता है। इस शहर का नाम महाभारत के पात्र भीम के नाम पर रखा गया है

चूँकि आँध्रप्रदेश में मेरा प्रवास विजयनगरम में था तो मैं वहीं से इस बीच को देखने गई थी यहां से यह लगभग २८ km था। हमने इसको देखने के लिए एक पब्लिक हॉलिडे का दिन तय किया था तो वहाँ पर कोई लोकल मेला भी लगा था। लोगो का हुजूम होने के बावजूद भी यहां एक अलग ही सुकून था। जिसे शब्दों में बयान नहीं कर सकते वहां जाकर ही यह अहसास पाया जा सकता है। यहां आकर पता चला की इसका ऐतिहासिक महत्व भी था। पुर्तगालियों का यह महत्वपूर्ण बंदरगाह था और आसपास काफी चर्च भी देखने को मिले।